परमाणु परीक्षण का हासिल

आकार पटेल

वर्ष 1998 की 11 और 13 मई को राजस्थान के पोखरण में भारत ने पांच परमाणु परीक्षण किये थे। यह 24 वर्ष पूर्व 1974 में पोखरण में ही हुए परमाणु परीक्षण के बाद हुआ था। इंदिरा गांधी ने परीक्षण कर उन नियमों का उल्लंघन किया था, जिनके तहत परमाणु तकनीक कनाडा से ली गयी थी और इसके लिए उन्हें प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा था। पहला परमाणु परीक्षण निश्चित रूप से अस्थिर समय में किया गया था। इस परीक्षण के 10 वर्ष पूर्व 1960 के मध्य में चीन परमाणु शक्ति और संयुक्त राष्ट्र में परमाणु बम हासिल करनेवाला पांचवां वीटो धारक बन गया था। तब दुनिया के ज्यादातर देश युद्धरत थे।

जब इंदिरा गांधी ने परीक्षण किया था, तब अमेरिका का वियतनाम में खूनी संघर्ष और अफगानिस्तान में सोवियत संघ की घुसपैठ खात्मे की ओर थी। उस दौर में दुनिया में संघर्ष आम बात थी। कोरियाई युद्ध के दौरान अमेरिका के शीर्ष जनरल मैकआर्थर ने चीन और उत्तर कोरिया के खिलाफ परमाणु हमले की लापरवाह धमकी दी थी, इसलिए अमेरिका भी चिंतित था। करीब पांच दशक पहले इंदिरा गांधी द्वारा किये गये परीक्षण की यही पृष्ठभूमि थी।

वर्ष 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में इस तरह का कोई दबाव नहीं था। यह शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद का, सोवियत संघ के बिखराव और सूचना तकनीक क्रांति के उभार का दौर था। उत्तर कोरिया, एक बड़ी सैन्य ताकत था, लेकिन वहां लाखों लोग गरीब थी। 1998 में हुए परीक्षण को लेकर कोई बहस नहीं हुई थी। वाजपेयी सरकार अपने पहले 13 दिन के शासनकाल के दौरान ही परमाणु परीक्षण करना चाहती थी, लेकिन चिंतित नौकरशाही इसके लिए तैयार नहीं थी। इसलिए परमाणु परीक्षण को हल्के में लिया गया था। परमाणु परीक्षण के बाद पटाखों और मिठाईयों के साथ उत्सव मनाया गया था, जिससे परीक्षण के बाद कोई बहस नहीं हो सकी और न ही सवाल पूछे गये या जवाब दिये गये। आइये, बीस वर्ष बाद हम कुछ सवालों पर नजर डालते हैं।

पहला सवाल, क्या इस परीक्षण से भारत परमाणु शक्ति बन गया? इसका उत्तर है- नहीं। इंदिरा गांधी और भारत को 1974 के बाद विश्व ने दंडित किया और उसे परमाणु तकनीक देने से मना कर दिया, क्योंकि हमने परीक्षण कर नियमों का उल्लंघन किया था। वर्ष 1998 के परीक्षण में इसे ही दोहराया गया। दूसरा सवाल, क्या इससे भारत सुरक्षित हुआ? नहीं, पोखरण के एक वर्ष बाद मई, 1999 में पाकिस्तान ने हमें कारगिल युद्ध के लिए उकसाया। उसके 10 वर्ष बाद मुंबई में हमला हुआ। वास्तव में कश्मीर में संघर्ष का सबसे हिंसक दौर पोखरण परीक्षण के बाद 2001 में देखा गया, जब 4,500 लोग मारे गये थे।

तीसरा सवाल, क्या इससे हमारी परमाणु तकनीक बेहतर हुई? इसका उत्तर भी नहीं है। मनमोहन सिंह सरकार ने अमेरिका के साथ एक सौदा किया था, लेकिन वह परवान नहीं चढ़ सका। चौथा, क्या इससे भारत का रुतबा बढ़ा? नहीं। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद् का सदस्य बनना चाह रहा है। परमाणु परीक्षण से उसमें कोई मदद नहीं मिली, बल्कि नुकसान ही हुआ। पांचवां सवाल, क्या परीक्षण के बाद परमाणु तकनीक के कारण हमें ज्यादा विद्युत उत्पादन में मदद मिली? नहीं। भारत का ध्यान आजकल परमाणु की बजाय सौर ऊर्जा उत्पादन पर है।
छठवां, क्या इसने दक्षिण एशिया क्षेत्र में शक्ति केंद्र को बदल दिया? नहीं। पोखरण के कुछ ही दिनों बाद पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के चगाई क्षेत्र में परीक्षण किया और आज इस उपमहाद्वीप में परमाणु गतिरोध उत्पन्न हो गया है। चीन ने हमारे क्षेत्र में मजबूती से आर्थिक पहल को बढ़ावा दिया है और आज हमारी चिंता उसकी सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि उससे हमारे विकल्पों को बचाने की है। सूत्र बताते हैं कि परमाणु हथियारों के निर्माण में पाकिस्तान हमसे आगे निकल चुका है। इसमें कोई विवाद नहीं है कि 1998 में हमारे द्वारा उठाये गये कदम ने इसे बढ़ावा दिया है। इन सारी बातों को जानने के बाद भी क्या हमें और परीक्षण करना चाहिए? इस प्रश्न को मैं पाठकों के ऊपर छोड़ता हूं। परमाणु परीक्षण से होनेवाला एक भी फायदा मुझे नहीं दिखा। हां, मैं एक महत्वपूर्ण नुकसान देख पा रहा हूं। पिछली शताब्दी के तिमाही में 1998-1999 अकेला ऐसा वर्ष था, जब भारत में विदेशी निवेश नकारात्मक रहा।

उस वर्ष विदेशी मुद्रा भारत से बाहर चली गयी, क्योंकि पूंजी को कभी भी इस तरह की अनिश्चितता पसंद नहीं आती। भारत और इसकी अर्थव्यवस्था को इस कारण होनेवाले नुकसान पर कभी चर्चा नहीं हुई। इसकी 20वीं वर्षगांठ पर किसी उत्सव का न होना यह सिद्ध करता है कि हम ऐसे आगे बढ़ गये, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।

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