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कर्नाटक चुनाव परिणाम का संदेश और पार्टियां

सियासी उठापटक के बीच अहम सवाल यह है कि इस चुनाव परिणाम के संदेश क्या हैं? भाजपा को कर्नाटक में मिली सफलता को क्या दक्षिण में उसकी स्वीकार्यता मानी जा सकती है? राज्यों में लगातार चुनाव हार रही कांग्रेस को क्या खुद को बदलने की जरूरत है? दक्षिण के अलावा अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव पर इसका कितना असर पड़ेगा?

कर्नाटक चुनाव परिणाम घोषित हो चुके हैं। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई है। कांग्रेस दूसरे और सबसे कम सीटों के साथ जदएस तीसरे नंबर पर रही। किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है। लिहाजा अब वहां सरकार बनाने के लिए भाजपा और कांग्रेस व जदएस मिलकर सक्रिय हो गए हैं। दोनों ही दलों के नेताओं ने राज्यपाल से मुलाकात की है। सियासी उठापटक के बीच अहम सवाल यह है कि इस चुनाव परिणाम के संदेश क्या हैं? भाजपा को कर्नाटक में मिली सफलता को क्या दक्षिण में उसकी स्वीकार्यता मानी जा सकती है? राज्यों में लगातार चुनाव हार रही कांग्रेस को क्या खुद को बदलने की जरूरत है? दक्षिण के अलावा अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव पर इसका कितना असर पड़ेगा? क्या कर्नाटक चुनाव परिणाम लोकसभा चुनाव को प्रभावित करेंगे?

कर्नाटक चुनाव परिणामों ने कई संदेश दिए हैं। भाषाई दिक्कतों के बावजूद भाजपा को यहां बड़ी सफलता मिली। आम तौर पर भाजपा को हिंदी पट्टी की पार्र्टी माना जाता रहा है। दक्षिण में मिली सफलता ने भाजपा का दायरा बढ़ा दिया है। भाजपा ने भाषाई समस्या को दरकिनार कर वहां की जनता से संवाद स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। बिना जनता से संवाद स्थापित किए भाजपा को यह सफलता नहीं मिलती। आने वाले दिनों में दक्षिण के अन्य राज्यों में होने वाले चुनाव पर इसका निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा। कर्नाटक के बाद दक्षिण भारत के पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, जिसमें तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का नंबर पहले है। यहां विधानसभा के चुनाव वर्ष 2019 के शुरुआत में होंगे। इस समय देश में लोकसभा चुनाव का भी माहौल गर्म रहेगा। इसके बाद 2021 में तीन राज्यों तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी में चुनाव होंगे। इन सब पर कर्नाटक चुनाव के नतीजों का असर पड़ेगा। वहीं कांग्रेस को लगातार मिल रही हार से पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। हालांकि हार के लिए पार्टी की कार्यशैली भी कम जिम्मेदार नहीं है। वे अभी भी आम जनता से संवाद स्थापित करने में अपने विपक्षी भाजपा से बहुत पीछे है। कांग्रेस को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। यही नहीं अब तो वह क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनती जा रही है। एक राष्टï्रीय पार्टी का क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनना गंभीर चिंता का विषय है। कांग्रेस को संगठन से लेकर बूथ स्तर तक अपने को सुधारने की जरूरत है। यदि कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया तो बाकी बचे राज्यों से भी वह बेदखल हो जाएगी। और अंतिम बात यह कि कर्नाटक में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने क्षेत्रीय दल जदएस को हल्के में लिया। लिहाजा यहां खंडित जनादेश आया।

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