रोजगार और सामाजिक सुरक्षा

डॉ अनुज लुगुन

मई दिवस का सप्ताह श्रमिकों के संघर्ष के इतिहास, उनके अधिकार और भविष्य में उनकी स्थिति के विश्लेषण, बहस और नारेबाजी का सप्ताह बन जाता है। ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ के बुलंद नारों के साथ यह धीरे-धीरे अगले मई दिवस तक के लिए गुम हो जाता है। श्रम और उसके मूल्य का संबंध मानव समाज के इतिहास के साथ जुड़ा हुआ है। विभिन्न समय में यह अलग-अलग रूपों में परिभाषित होता रहा है।
जब श्रम करनेवाले असंगठित रहे, तब श्रम और उसके मूल्य की व्यवस्था अलग थी और जब संगठित हुए, तो नयी व्यवस्था के तहत उचित मूल्य ही नहीं, बल्कि मूल्य के साथ गरिमामय जीवन जीने की मांग भी जुड़ी और यह दुनियाभर के श्रमिक आंदोलनों द्वारा सामने आयी। इसने समाज में उत्पादन के लिए अनिवार्य श्रम, श्रमिक और उसके मूल्य की उचित व्यवस्था को लागू करवाया, जिसके तहत श्रमिकों के आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी तय की गयी। श्रमिकों के लिए आवास, चिकित्सा, वेतन, भत्ता, परिवारों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि की व्यवस्था हुई। इन्हीं रूपों में श्रमिकों के श्रम को रोजगार के रूप में व्यवस्थित परिभाषा दी गयी।

रोजगार का संबंध काम से, काम का संबंध श्रम से, श्रम शारीरिक एवं मानसिक हैं। श्रम करनेवाला श्रमिक है। श्रमिकों के लिए श्रम का उचित मूल्य और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था जरूरी है। यानी रोजगार की मांग श्रमिकों की समुचित मानवीय व्यवस्था की मांग है, न कि जीविका के नाम पर फौरी व्यवस्था। दुनियाभर में मजदूरों ने काम के घंटे, वेतन, भत्ता, स्वस्थ परिवेश इत्यादि की जो लड़ाई लड़ी है, उसका इससे अनिवार्य संबंध है। इस आधार पर यदि हम आज की वैश्विक दुनिया में रोजगार की तहकीकात करें, तो भरा पूरा अकाल दिखायी देता है। इसका उदाहरण इस वर्ष मई दिवस के अवसर पर दुनियाभर में हुए भारी विरोध प्रदर्शनों में देखा जाता है।

वैश्वीकरण से जो असमानता बढ़ी, उसका असर श्रमिक समाज पर पड़ा है, क्योंकि अब श्रमिक भी बाजार में एक ऐसा वस्तु है, जिसका मूल्य कम हो तो वह जीवित है अन्यथा मृत। उसकी सुरक्षा राज्य या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं रह गयी है। सरकारों का रोजगार सृजन का सामाजिक दायित्व अब खुले तौर पर बाजार को सौंप दिया गया है। इससे रोजगार का भयावह संकट उत्पन्न हो गया है। अब रोजगार के नाम पर अस्थायी काम, दैनिक मजदूरी, या ठेके पर काम दिया जाने लगा है। शिक्षा आदि के क्षेत्र में कॉन्ट्रैक्ट, गेस्ट, एडहॉक, पारा शिक्षा, शिक्षामित्र रखे जा रहे हैं। जिन्हें फुलपेड वेतन नहीं दिया जाता, न ही भत्ता की समुचित व्यवस्था होती है। यूएनओ के अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी रिपोर्ट ‘वल्र्ड एम्प्लॉयमेंट सोशल आउटलुक ट्रेंड्स-2018’ में दुनियाभर में बेरोजगारी की दरों को प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार दक्षिण एशिया के देशों में रोजगार में भारी गिरावट है। इस रिपोर्ट में भारत में बेरोजगारी दर के बढऩे का अनुमान लगाया गया है। देश में यह दर वर्ष 2018-19 में 3.5 प्रतिशत रहेगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उच्च आर्थिक वृद्धि दर के बावजूद भारत में यह स्थिति है। आंकड़ों के मुताबिक, एक रोजगार के मुकाबले सत्ताइस डिग्रीधारकों का अनुपात है। यह वित्तीय वर्ष 2012-13 की तुलना में तीन गुना बढ़ गया है। यानी रोजगार के सृजन में कमी आयी है। आईएलओ की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साल 2019 तक 72 प्रतिशत कामगारों के रोजगार अतिसंवेदनशील स्थिति में होंगे। युवाओं को रोजगार देने के हमारे प्रधानमंत्री मोदी की घोषणाओं का सच इस रिपोर्ट में देखा जा सकता है। ध्यान रहे, रोजगार के इन आंकड़ों से उससे जुड़ी सामाजिक सुरक्षा की स्थिति का पता नहीं चलता है। रोजगार के साथ सामाजिक सुरक्षा का न होना मानवीय विकास सूचकांक पर बुरा असर डालता है। किसी कंपनी या संस्था के कर्मचारी या, कारखाना में काम करनेवाले मजदूर के वेतन में सामाजिक सुरक्षा के साधनों जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पेंशन इत्यादि का न होना उनके जीवन को अस्थिर और अनिश्चित बना देता है। असंगठित क्षेत्र के रोजगार तो गंभीर रूप से असुरक्षित हैं। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने जिस तरह से खुदरा व्यवसाय, लघु-कुटीर उद्योगों एवं कृषि से जुड़े रोजगारों को ध्वस्त किया है, उससे उपजे पलायन ने रोजगार का भयानक संकट पैदा किया है। हमारे राजनेता रोजगार के बारे में सबसे ज्यादा भ्रम फैलाते हैं। कोई युवाओं को सरकारी नौकरी के पीछे भागने के बजाय पान बेचने, गाय पालने की सलाह देता है, तो कोई ‘पकौड़े बेचने’ को रोजगार कहता है।

क्या जीविका के साधन और रोजगार में फर्क नहीं है? क्या हर आजीविका के साधनों के साथ सामाजिक सुरक्षा और गरिमा की व्यवस्था है? जंगलों में केंदु पत्ता एकत्रित करना आदिवासियों की जीविका है, क्या इसे भी रोजगार कहेंगे? रोजगार और जीविका का फर्क यह है कि रोजगार श्रम का व्यवस्थित सामाजिक मानवीय रूप है और जीविका के हर साधनों को उस स्तर तक उठाना ही रोजगार का सृजन है। उदारवादी अर्थव्यवस्था ने श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था को खत्म कर दिया। इसकी सबसे ज्यादा मार युवाओं पर पड़ रही है। इससे हमारे युवा संशय, अनिश्चितता और अवसाद की स्थिति में हैं।

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