बिना तथ्य संघ पर आरोप लगाना गलत

लोकेन्द्र सिंह

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकारों का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में अध्ययन ठीक नहीं है। इसलिए जब भी राहुल गांधी संघ के संबंध में कोई टिप्पणी करते हैं, वह बेबुनियाद और अतार्किक होती है। संघ के संबंध में वह जो भी कहते हैं, सत्य उससे कोसों दूर होता है। एक बार फिर उन्होंने संघ के संबंध में बड़ा झूठ बोला है। अब तक संघ की नीति थी कि वह आरोपों पर स्पष्टीकरण वक्तव्य से नहीं, अपितु समय आने पर अपने कार्य से देता था। संचार क्रांति के समय में संघ ने अपनी इस नीति को बदल लिया है। यह अच्छा ही है। वरना, इस समय झूठ इतना विस्तार पा जाता है कि वह सच ही प्रतीत होने लगता है। झूठ सच का मुखौटा ओढ़ ले, उससे पहले ही उसको बेनकाब करने का समय आ गया है।

आरएसएस के संबंध में राहुल गांधी के हालिया बयान पर संघ ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य ने वक्तव्य जारी कर कहा है कि कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी ‘घिनौनी राजनीति’ कर रहे हैं। संघ झूठ के आधार पर चलने वाली उनकी घिनौनी राजनीति की भत्र्सना करता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने अधिकृत फेसबुक पेज पर आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और सह-सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य के संबंध में झूठी बातें लिखी हैं। राहुल गांधी ने पोस्ट में लिखा है कि आरएसएस के लोग अनुसूचित जाति-जनजातियों को संविधान में दिए गए आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं। जबकि संघ के सरसंघचालक या किसी भी अन्य शीर्ष अधिकारी ने कभी भी आरक्षण को समाप्त करने की बात नहीं की है। आरक्षण पर संघ पदाधिकारियों के वक्तव्य को मीडिया ने भी तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया है। चाहे वह सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का पांचजन्य में प्रकाशित साक्षात्कार के एक अंश का मामला हो या फिर सह-सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य का अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख रहते जयपुर साहित्य उत्सव में दिए गए वक्तव्य पर मचा बवाल हो। यदि आरक्षण पर हम संघ के दृष्टिकोण को देखेंगे तो पाएंगे कि वह आरक्षण को जारी रखने के पक्ष में हैं।

विचार करने योग्य है कि राहुल गांधी ने अपने आरोपों के संबंध में कोई तथ्य और तर्क प्रस्तुत नहीं किया है। उन्होंने अपने फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल पर लगभग दो मिनट का एक वीडियो जरूर जारी किया है। इसमें 2016 में गुजरात के उना में दलितों के साथ हुई मारपीट की घटना की क्लिप और मध्य प्रदेश में पुलिस भर्ती परीक्षा के दौरान कुछ उम्मीदवारों के सीने पर एससी-एसटी लिखे जाने की घटना का उल्लेख है। वीडियो में यह आरोप लगाया है कि आरएसएस और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के उकसावे पर यह घटनाएं हो रही हैं। किंतु यह भी बिना प्रमाण के कहा गया है। दरअसल राहुल अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के प्रति नफरत की भावना को जन्म देने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि यह वर्ग मोदी के विरोध में खड़ा हो जाए और कांग्रेस उसका लाभ उठा सके। इस प्रयास में वह सफेद झूठ बोलने में भी कोई संकोच नहीं कर रहे हैं। भले ही उनके झूठ का खामियाजा समाज को भुगतना पड़ रहा हो। एससी-एसटी एक्ट में बदलाव पर राहुल गांधी ने अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के गुस्से को और अधिक भडक़ाने के लिए साफ झूठ बोला था।

भाजपा एवं मोदी सरकार को ‘दलित विरोधी’ बताने के लिए उन्होंने अफवाह फैलाई की एससी-एसटी एक्ट को हटा दिया गया है। किसी राष्ट्रीय नेता द्वारा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और लाभ के लिए इस प्रकार के झूठ बोलना घिनौनी राजनीति ही है। संघ समाज में सामाजिक समरसता का वातावरण बनाने के लिए संकल्पबद्ध है। इसलिए संघ पर आक्षेप लगाते समय राहुल गांधी को अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए। आरएसएस उनका राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं है। इसके बावजूद राहुल गांधी अपनी राजनीतिक लड़ाई में भाजपा के साथ बार-बार संघ को भी घसीट रहे हैं। संघ की तुलना आतंकवादी समूह सिमी से करना और संघ पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाना गलत है। उनको अपना राजनीतिक सलाहकार बदल लेना चाहिए या फिर स्वयं संघ के संबंध में अध्ययन प्रारंभ करना चाहिए। राहुल गांधी अब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, इसलिए उन्हें अब परिपक्वता दिखानी चाहिए। सोच-विचार कर बोलना चाहिए। झूठ के सहारे नौका पार नहीं लगती, बल्कि बीच भंवर में डूब जाती है। कांग्रेस और राहुल गांधी संघ के संबंध में जितना झूठ बोलेंगे, जनता के बीच उतना ही अधिक निंदा के पात्र बनेंगे। इसलिए उन्हें संघ पर झूठे आरोप लगाने से बचना चाहिए। यह उनके ही हित में है।

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