जिद… सच की

कौन है गोमती के दर्द का जिम्मेदार

सवाल यह है कि गोमती की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन है? क्या विकास का अभिशाप उसका दम घोंट रहा है? क्या नदी में कचरा फेंक रहे लोग उसे हमेशा के लिए खत्म कर देने पर आमादा हैं? अविरल और निर्मल गोमती का वादा क्या दिवास्वप्न है या फिर इसके लिए कुछ हो भी रहा है? क्या शहर की गंदगी ढोते-ढोते गोमती का दम फूल चुका है और वह अंतिम सांसें गिन रही है?

SANJAY SHARMA - EDITOR

संजय शर्मा – संपादक

जीवनदायनी गोमती का दर्द अब असहनीय हो चुका है। प्रदूषण की मार झेलते-झेलते वह इतनी कमजोर हो चली है कि सूरज का ताप भी नहीं सहन कर पा रही है। उसके दर्द की दवा करने वाले दावे उसके तट पर पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। नदी का जलस्तर घट रहा है। वह सूखने की कगार पर पहुंच चुकी है। गोमती तिल-तिल कर मर रही है। सवाल यह है कि गोमती की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन है? क्या विकास का अभिशाप उसका दम घोंट रहा है? क्या नदी में कचरा फेंक रहे लोग उसे हमेशा के लिए खत्म कर देने पर आमादा हैं? अविरल और निर्मल गोमती का वादा क्या दिवास्वप्न है या फिर इसके लिए कुछ हो भी रहा है? क्या शहर की गंदगी ढोते-ढोते गोमती का दम फूल चुका है और वह अंतिम सांसें गिन रही है?

देश में गोमती समेत तमाम नदियों की हालत बेहद खराब है। नदियों की इस दुर्दशा केलिए बहुत कुछ हमारी विकास की अवधारणा जिम्मेदार है। इस अवधारणा में जीवनदायिनी नदियां कहीं नहीं हैं। वे बस शहर की गंदगी और उद्योगों का प्रदूषित कचरा ढोने का माध्यम बनकर रह गई हैं। गोमती इसका जीता-जागता उदाहरण है। मौजूदा समय में करीब 37 नालों से गोमती में रोजाना लाखों लीटर गंदा पानी बिना संशोधित किए बहाया जा रहा है। इसके अलावा कारखानों से निकलने वाले जहरीले रसायनिक पदार्थ भी नदी में बिना संशोधित किए बहाए जा रहे हैं। रही सही कसर जनता निकाल दे रही है। नदी में पालीथिन में कचरा भरकर फेंका जा रहा है। इसके कारण नदी लगातार प्रदूषित हो रही है। पिछले चार सालों में गोमती का प्रदूषण स्तर चार गुना बढ़ चुका है। हालांकि सरकार ने इसे अविरल और निर्मल बनाने का वादा किया है, लेकिन इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा सके हैं। यही नहीं आदेश के बावजूद गोमती में गिरने वाले नालों को आज तक डायवर्ट नहीं किया गया है। इन कारणों के चलते गोमती का न केवल जलस्तर घट रहा है बल्कि नदी के जल-जीवों पर भी इसका खराब असर पड़ रहा है। प्रदूषण के कारण पानी में आक्सीजन की मात्रा कम होने के कारण नदी के जलीय जीव लुप्त होने लगे हैं। ये जलीय जीव नदियों को साफ-सुथरा रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके कारण गोमती की स्थिति बेहद खतरनाक हो चुकी है। यदि गोमती की दशा सुधारने के लिए तेजी से ठोस कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नहीं जब गोमती भी सरस्वती नदी की तरह इतिहास में दर्ज होकर रह जाएगी। इसका सीधा असर गोमती के किनारे बसे शहरों पर पड़ेगा। यहां जलापूर्ति ठप हो जाएगी। खेती चौपट हो जाएगी और लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस जाएंगे।

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