तो क्या मोदी ने मान ली चीन की तय की गयी सीमा

कुलदीप नैय्यर

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गर्व से चीन के प्रधानमंत्री चू एन-लाई का समर्थन किया था। वह फस्र्ट फ्रंट के सेना प्रमुख चियांग काई शेक को हरा कर आए थे। चीन के प्रधानमंत्री ने भारत की आजादी के आंदोलन का समर्थन किया था, जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि भारत की आजादी दूसरे विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की विजय पर निर्भर नहीं है। ब्रिटेन और उसी तरह के बाकी लोकतांत्रिक ताकतों को अमेरिका का समर्थन घोषित हो जाने के बाद मित्र राष्ट्रों की विजय तय हो चुकी थी। जबकि चू एन-लाई ने नेहरू के साथ विश्वासघात किया। उसका भारत पर हमला करना एक ऐसा प्रहार था जिसे नेहरू बर्दाश्त नहीं कर पाए। नई दिल्ली ने बीजिंग से अपना राजदूत वापस बुला कर अपनी नाराजगी प्रकट की थी। इसके बाद से, दोनों देशों के रिश्तों में खटासपन चली आ रही है।

हाल की घटनाओं से ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने चीन की ओर से तय सीमा मान ली है। सत्ताधारी भाजपा भले ही कानूनी बातें स्वीकारने का तर्क दे लेकिन ऐतिहासिक क्षण मान कर जिसका स्वागत किया जा रहा है वह बीजिंग के सामने दयनीय आत्म-समर्पण है। वास्तव में, यह एक पराजय है। अगर कांग्रेस पार्टी ने यह किया होता तो भारत को बेचने वाली शक्ति के रूप में उसका जुलूस निकाल दिया जाता। शायद मोदी अपनी लच्छेदार हिंदी के कारण जनता के गले अच्छी तरह उतर सकते हैं क्योंकि वह सीमा समस्या की बारीक बातों को नहीं समझती है। लेकिन, अचरज की बात यह है कि पार्टी को नागपुर मुख्यालय का समर्थन प्राप्त है जहां से आरएसएस आलाकमान काम करता है। चीन और भारत कभी कभार ही इस पर सहमत हुए हैं कि असली सीमा-रेखा किस जगह है। नेहरू ने कहा था कि उन्होंने भारतीय सेना को घुसपैठियों को बाहर भगाने और क्षेत्र साफ करने का आदेश दिया है। उस समय से, दोनों के बीच रिश्ते कमोबेश दुश्मनी के हैं। कुछ समय पहले, डोकलाम में जिद के समय भारत ने अपनी ताकत दिखाई। चीन को मौजूदा सीमा से पीछे हटना पड़ा। प्रधानमंत्री मोदी की पिछले सितंबर में ब्रिक्स के दौरान हुई यात्रा से तनाव जरूर कम हुआ। उस समय, मोदी की यात्रा का सकारात्मक पक्ष यह था कि दोनों देशों ने आतंकवाद से लडऩे की बात दोहराई थी। लेकिन यहां भी, चीन ने अपना ही सिद्धांत रखा। नई दिल्ली की चिंता चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ती मित्रता है।

भारत ने इस बेइज्जती को चुपचाप सहन कर लिया। चीन ने बिना किसी आपत्ति के अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा बताने वाले नक्शे को स्वीकार कर लिया। अरुणाचल प्रदेश और चीन की सीमा के बीच के एक छोटे से क्षेत्र को लेकर विवाद की याद करने के लिए, अरुणाचल प्रदेश की स्थिति पर कभी कभार ही सवाल उठाया गया है। चीन के लिए तिब्बत भारत के कश्मीर की तरह है जिसने आजादी का झण्डा उठा लिया है। लेकिन दोनों के बीच एक अंतर है दलाई लामा चीन के मातहत एक स्वायत्त स्थिति स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, कश्मीर आज आजादी चाहता है। संभव है, कश्मीरी एक दिन घूम-फिर कर वैसी ही स्थिति स्वीकार करने को मान जाएं। समस्या इतनी जटिल है कि एक मामूली परिवर्तन बड़ी विपदा में तब्दील हो सकता है। यह जोखिम उठाने लायक नहीं है। पिछले साल, दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश यात्रा ने चीन के तिब्बत को अपने में मिलाने के कुछ दिनों पहले की याद दिला दी। नेहरू ने उस समय कोई आपत्ति नहीं उठायी क्योंकि चीन के प्रधानमंत्री चू एन लाई के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध थे। दलाई लामा की यात्रा ने तिब्बत के बारे में संदेह पैदा नहीं किया, लेकिन एक बार फिर बीजिंग की ओर से तिब्बत के विलय पर बहस को ताजा कर दिया। फिर भी, भारत ने अपनी स्थित बिनाए रखने में सफलता पाई।
वास्तव में, भारत के साथ चीन की समस्या की जड़ें अंग्रेजों की ओर से किए गए भारत-चीन सीमा के निर्धारण में हैं। चीन मैकमोहन रेखा को मानने से मना करता है जो अरुणाचल प्रदेश को भारत के एक हिस्से के रूप में बताता है। इस क्षेत्र में होने वाले किसी भी गतिविधि को चीन शक की नजर से देखता है।

इस बीच, भारत और चीन दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और लोगों के बीच के आदान-प्रदान के लिए एक उच्चस्तरीय यंत्रणा बनाने पर सहमत हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी तथा चीन के प्रधानमंत्री शी चिनफिंग की शिखर वार्ता में इस पर भी जोर दिया गया कि चीन भारत के बीच विकास संबंधी करीबी साझेदारी हो ताकि दोनों सदैव सही दिशा में चलें। यह शुभ संकेत है।

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