जिद… सच की

यूपी में बढ़ते अपराध और पुलिस तंत्र

अहम सवाल यह है कि क्या प्रदेश में अपराधों पर अंकुश लगाने में पुलिस तंत्र नाकाम हो चुका है? क्या पुलिस विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार इसकी बड़ी वजह है? अपराधी पुलिस के शिकंजे से बच क्यों रहा है? क्या पुलिस का खुफिया तंत्र पूरी तरह लचर हो चुका है? क्या सरकार और आला अधिकारियों के आदेश बेअसर साबित हो रहे हैं?

तमाम दावों के बावजूद उत्तर प्रदेश में अपराधियों के हौसले कम नहीं हो रहे हैं। अपराधी आए दिन हत्या, बलात्कार, डकैती जैसे गंभीर अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। मुठभेड़ें भी अपराधियों पर खाकी का खौफ पैदा नहीं कर पा रही हैं। दुस्साहस का आलम यह है कि बदमाशों ने इलाहाबाद में सरेराह भाजपा सभासद की हत्या कर दी और प्रतापगढ़ में एक लेखपाल को गोली मार दी। इन घटनाओं से साफ है कि प्रदेश को अपराध मुक्त करने की दिशा में पुलिस अभी बहुत सक्रिय नहीं दिख रही है। अहम सवाल यह है कि क्या प्रदेश में अपराधों पर अंकुश लगाने में पुलिस तंत्र नाकाम हो चुका है? क्या पुलिस विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार इसकी बड़ी वजह है? अपराधी पुलिस के शिकंजे से बच क्यों रहा है? क्या पुलिस का खुफिया तंत्र पूरी तरह लचर हो चुका है? क्या सरकार और आला अधिकारियों के आदेश बेअसर साबित हो रहे हैं? क्या कानून व्यवस्था की ऐसी स्थिति में प्रदेश में निवेशक पूंजी लगाने को तैयार होंगे?

प्रदेश में अपराधों का ग्राफ बढऩे की सबसे बड़ी वजह खुद पुलिस का रवैया और विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार है। कई बार तो अपराधी पुलिस के साथ मिलीभगत कर अपराधों को अंजाम देते हैं। यही नहीं कई बार तो पुलिस इसमें सीधे-सीधे शामिल भी होती है। ऐसे कई मामले प्रकाश में आ चुके हैं। वारदातों के बाद पुलिस लापरवाही बरतती है। लिहाजा अपराधी आसानी से पुलिस के चंगुल से निकल भागते हैं। खुफिया तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। मुखबिरों की फौज स्थानीय पुलिस के सबसे महत्वपूर्ण सूचना स्रोत होते हैं लेकिन इस तंत्र का न तो इस्तेमाल किया जाता है न ही इस पर पुलिस विभाग ध्यान दे रहा है। इसका परिणाम यह है कि अपराधी का सुराग नहीं मिल पाता है और तमाम घटनाओं के खुलासे में पुलिस नाकाम साबित होती है। इसके अलावा थाने में कई बार पीडि़तों की शिकायतें दर्ज नहीं की जाती हैं। पुलिस पीडि़तों पर अपराधी से समझौता करने तक का दबाव बनाती है। वहीं पुलिस विभाग में मानव संसाधन और अन्य सुविधाओं की कमी है।

सके कारण वह गहन जांच-पड़ताल करने में दिलचस्पी नहीं दिखाती है। बढ़ता साइबर क्राइम भी पुलिस के लिए सिरदर्द हो चुका है। इन साइबर अपराधियों से निपटने में पुलिस समक्ष नहीं है। अधिकांश पुलिस कर्मी साइबर क्राइम को हैंडल करने का तरीका तक नहीं जानते हैं। जाहिर है यदि प्रदेश को अपराध मुक्त करना है तो अपराधियों पर शिकंजा कसना होगा। खुफिया तंत्र को मजबूत करना होगा। इसके अलावा विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार को खत्म करना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया तो अपराध पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा।

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