महाभियोग, सियासत और न्यायपालिका की गरिमा

सवाल यह है कि क्या कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल महाभियोग का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या न्यायिक प्रक्रिया से सियासी दलों का विश्वास उठ गया है? क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से अपना सियासी हित नहीं साध पाने से नाराज कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई कर रहे हैं?

कांग्रेस के नेतृत्व में सात विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी शुरू कर दी है। इन दलों के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को इस आशय का नोटिस सौंप दिया है। भाजपा ने कांग्रेस के इस कदम को न्याय का राजनीतिकरण करार दिया है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल महाभियोग का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या न्यायिक प्रक्रिया से सियासी दलों का विश्वास उठ गया है? क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से अपना सियासी हित नहीं साध पाने से नाराज कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई कर रहे हैं? क्या सियासी हितों के लिए इस प्रकार के गंभीर और संविधान में दिए गए अधिकारों का प्रयोग किया जाना उचित है? क्या पार्टियों के एजेंडे के मुताबिक कोर्ट फैसला सुनाए?
जज बीएच लोया की मौत मामले में सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से कांग्रेस परेशान है। कोर्ट ने अपने फैसले में न केवल जज लोया की मौत को स्वाभाविक माना बल्कि सियासी दलों पर भी सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि सियासी लड़ाई संसद में लड़ी जानी चाहिए, अदालतों में नहीं। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की तीन सदस्यीय पीठ ने जनहित याचिका के सियासी इस्तेमाल पर भी चिंता जाहिर की थी। फैसले को लेकर भाजपा ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर जमकर निशाना साधा था, लिहाजा अपनी नाक बचाने के लिए कांग्रेस ने यह नया दांव चला है। हालांकि महाभियोग के प्रस्ताव पर खुद कांग्रेस में फूट दिखाई दे रही है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत कई वरिष्ठï कांग्रेसी नेताओं ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया है। बावजूद इसके कांग्रेस ने अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर महाभियोग का नोटिस राज्यसभा के सभापति को सौंप दिया है। यह प्रक्रिया शुरू होगी या नहीं यह बाद की बात है लेकिन जिस तरह से कांग्रेस व अन्य दलों ने लोया केस के फैसले के तुरंत बाद चीफ जस्टिस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, यह बेहद चिंता का विषय है। जब से कांग्रेस और अन्य दल सत्ता से बेदखल हुए हैं, वे संवैधानिक संस्थाओं को चोट पहुंचा रहे हैं। पहले ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा गया और अब न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। कोर्ट सबूतों, गवाहों और लंबी-लंबी तार्किक दलीलों को सुनने के बाद कोई फैसला सुनाता है। ऐसे में महाभियोग का दांव चल कर न्याय प्रणाली को नुकसान पहुंचाने से पार्टियों को बाज आना चाहिए। जनता सब देख और सुन रही है। उसे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर पूरा भरोसा है। ऐसे में न्याय का राजनीतिकरण सियासी दलों को भारी पड़ सकता है।

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