लोकसभा चुनाव: राम नाम के बाद अब भाजपा को च्रामजीज् का सहारा, दलित वोट बैंक पर नजर

सपा-बसपा की दोस्ती और दलित सांसदों के आक्रोश ने उड़ाई भाजपा की नींद
बाबा साहेब की जयंती पर दिखी दलितों को रिझाने की कोशिश

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। लोकसभा चुनाव में राम नाम के बाद भाजपा अब बाबा साहेब भीमराव रामजी आंबेडकर का सहारा लेने में जुट गई है। सपा-बसपा गठबंधन और दलित आंदोलन को लेकर दलित सांसदों के आक्रोश ने भाजपा की नींद उड़ा दी है। लिहाजा विपक्ष को शिकस्त देने के लिए भाजपा ने नया दांव चल दिया है। लोकसभा चुनाव नजदीक होने से दलित संगठनों द्वारा भारत बंद के दौरान हिंसक वारदातों के होने के बाद दलित राजनीति में बढ़ी गर्माहट का असर डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती समारोहों में नजर आया। सपा-बसपा के साथ भाजपा ने भी बाबा साहेब की जयंती धूमधाम से मनाकर संदेश दिया कि बाबा साहेब किसी विशेष दल के नहीं हैं और दलित वोट पर सिर्फ मायावती का ही नहीं भाजपा का भी हक है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार ने बाबा साहेब का नाम ही नहीं बदला बल्कि राजनीतिक दलों का नजरिया भी बदल दिया है। डॉ. आंबेडकर देश के सबसे बड़े पॉलिटिकल ब्रांड बन गए। आयोजनों को पैमाना माने तो डॉ. आंबेडकर ने राष्टï्रपिता महात्मा गांधी को भी पीछे छोड़ दिया है। यूपी में सभी राजनीतिक दलों में बाबा साहेब की जयंती मनाने की होड़ रही। दरअसल इसका बड़ा कारण उत्तर प्रदेश में बदला राजनीतिक परिदृश्य है। सपा-बसपा की दोस्ती को ओबीसी और दलित गठजोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

वोट बैंक की चाहत में सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने जयंती समारोह के बहाने शक्ति प्रदर्शन किया। जाहिर है कि 2019 के लोकसभा चुनाव नजदीक हैं ऐसे में महापुरुषों की प्रतिमाओं को लेकर खींचतान शुरू हो गई है। हर राजनीतिक दल में अपने-अपने महापुरुषों को बचाए रखने की होड़ मची है। हालांकि औपचारिक तौर पर सभी दल महापुरुषों को सभी का आदर्श बताते आ रहे हैं फिर भी अंदरखाने महात्मा गांधी, सरदार बल्लभ बाई पटेल और भीमराव रामजी आंबेडकर को अपना बनाने के लिए राजनीतिक दलों में होड़ लगी है।

पिछले लोकसभा व विधानसभा चुनावों में दलित वोटों में अपनी बढ़ी हिस्सेदारी साबित कर चुकी भारतीय जनता पार्टी 2019 में इसी वातावरण को बनाए रखने की कोशिश में है। मुख्य संगठन के अलावा अनुषांगिक संगठनों से भी आंबेडकर जयंती पर विभिन्न कार्यक्रम किये गये। भाजपा नेताओं ने दलित बस्तियों की ओर रुख किया। सरकार के मंत्रियों के अलावा प्रमुख नेताओं ने कार्यक्रम को कामयाब बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर हुए आंदोलन ने भी दलित राजनीति को केंद्र में ला दिया है। प्रदेश और देश में हाल में हुए घटनाक्रमों ने भाजपा की दलित राजनीति को चोट पहुंचाई है। ऐसे में भाजपा आंबेडकर जयंती को धूमधाम से मनाकर दलितों में अच्छा संदेश देने की कोशिश करती दिखी। यूपी में भी कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसके अलावा भाजपा आने वाले दिनों में राममंदिर का मुद्दा भी फिर से गरमाने की कोशिश करेगी। राममंदिर मामले पर सुप्रीम में सुनवाई चल रही है।

सपा-बसपा गठबंधन भी चिंतित

सपा-बसपा गठबंधन भी 2019 के चुनाव में दलित वोटों पर मजबूत पकड़ बनाए रखना चाहता है। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में मिली जीत ने दोनों दलों का उत्साह बढ़ा दिया है। हालांकि दलितों में भाजपा की सेंधमारी की कोशिश से सपा-बसपा दोनों चिंतित हैं। वे किसी भी कीमत में दलित वोटों को हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं। यदि भाजपा दलितों के वोट बैंक में सेंधमारी करने में सफल रही तो गठबंधन को बड़ा नुकसान हो सकता है। यही वजह है कि सपा ने भी दलित उत्पीडऩ की घटनाओं को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। सपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साफ कहा कि भाजपा शासित राज्यों में दलितों के खिलाफ अत्याचार की घटनाएं बढ़ रही हैं। वहीं बसपा प्रमुख मायावती एससी-एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर भाजपा पर हमला कर रही हंै।

कांगे्रस की भी दलित वोट पर नजर

कांग्रेस खुद को फिर से दलित हितैषी साबित करने के लिए जोर लगा रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दलितों के मुद्दे को लेकर लगातार मोदी सरकार पर निशाना साध रहे हैं। एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के संशोधन के खिलाफ कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया है। इस संशोधन के खिलाफ पिछले दिनों दलित संगठनों द्वारा भारत बंद आंदोलन का भी राहुल गांधी ने समर्थन किया था और ट्वीट कर आंदोलनकारियों का उत्साह बढ़ाया था।

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