चंपारण सत्याग्रह और मजहरुल हक

अफरोज आलम साहिल

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष का ‘जश्न’ मनाया जा रहा है। आज से करीब 101 साल पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बिहार की धरती पर पहली बार कदम रखा और चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत हुई। इस सत्याग्रह ने आजादी की लड़ाई का कलेवर ही बदल दिया, लेकिन जिस शख्स बैरिस्टर मौलाना मजहरुल हक के कारण गांधीजी बिहार में टिके, चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के समारोहों से उस शख्स को ही गायब कर दिया गया।
महात्मा गांधी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ‘मौलाना मजहरुल हक और मैं एक समय लंदन में पढ़ते थे। उसके बाद हम बम्बई में सन् 1915 की कांग्रेस में मिले थे। उन्होंने कहा था कि कभी पटना आएं, तो मेरे घर अवश्य पधारिए। मैंने उन्हें पत्र लिखा और अपना काम बताया। वे तुरंत अपनी मोटर लेकर आए और मुझसे अपने घर चलने का आग्रह किया। मैंने उनका आभार माना और उनसे कहा कि जिस जगह मुझे जाना है, वहां के लिए वे मुझको पहली ट्रेन से रवाना कर दें।’ उसके बाद गांधी ने बिहार विवि, पटना के उद्घाटन समारोह के अवसर पर छह फरवरी, 1921 को अपने भाषण में भी बताया, ‘मैं और मौलाना मजहरुल हक इंग्लैंड में साथ-साथ रहे और भारत लौटते हुए भी हम एक ही जहाज में थे। मुझे खुशी है कि मजहरुल हक के साथ मेरी मित्रता लगातार बढ़ती रही। दरअसल मैं पटना में उनके घर को अपना ही घर मानता हूं।’
बहरहाल, 10 अप्रैल, 1917 को गांधी चंपारण के राजकुमार शुक्ल के साथ जब कलकत्ता से पटना पहुंचे, तो राजकुमार उन्हें डॉ राजेंद्र प्रसाद के घर ले गये। डॉ प्रसाद शायद पुरी गये हुए थे। उनके बंगले पर उनका एक नौकर था।
घर पर मौजूद डॉ. प्रसाद के उस नौकर ने गांधी के साथ सही व्यवहार नहीं किया। गांधी इससे बेहद आहत हुए। इस बात का जिक्र उसी दिन अपने बेटे मगनलाल को लिखे पत्र में भी मिलता है। गांधी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वे अभी बिहार से वापस जाने के बारे में सोच ही रहे थे कि उन्हें मजहरुल की याद आ गयी। गांधी ने तुरंत उन्हें तार भेज दिया। मौलाना मजहरुल हक जल्दी ही डॉ राजेंद्र प्रसाद के घर पहुंचे और गांधीजी को वहां से अपने घर ले गये। उन्होंने गांधीजी को बहुत सम्मान दिया और आगे के मकसद पर बातचीत की। उनकी मदद से ही गांधी चंपारण पहुंचे और अहिंसा रूपी सत्याग्रह किया। उसके बाद देश की आजादी में जो कुछ हुआ, वह इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। अगर मजहरुल हक उस मोड़ पर गांधी का साथ न देते, तो शायद इतिहास कुछ और होता।
चंपारण के मोतिहारी में गांधी पर जब मुकदमा हुआ, तो इसकी खबर मिलते ही मजहरुल यहां पहुंच गये। गांधी ने एक बैठक भी आयोजित की, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि गांधी के जेल जाने के बाद मजहरुल हक और ब्रजकिशोर प्रसाद आंदोलन का नेतृत्व करेंगे। यह अलग बात है कि गांधी पर से मुकदमा वापस ले लिया गया।
गांधी अपनी आत्मकथा में एक जगह लिखते हैं, ‘मौलाना मजहरुल हक ने मेरे सहायक के रूप में हक दर्ज करा रखा था और वे महीने में एक-दो बार दर्शन दे जाते थे। उस समय के उनके ठाटबाट और दबदबे में और आज की सादगी में जमीन-आसमान का अंतर है। हमारे बीच आकर वे हम से हृदय की एकता साध जाते थे, पर अपनी साहबी के कारण बाहर के आदमी को वे हम से अलग जैसे जान पड़ते थे।’ मजहरुल हक के बारे में गांधी ने उनके देहांत पर संवेदना के रूप में 9 जनवरी, 1930 को यंग इंडिया में लिखा था, ‘मजहरुल हक एक निष्ठावान देशभक्त, अच्छे मुसलमान और दार्शनिक थे। बड़ी ऐश व आराम की जिंदगी बिताते थे, पर जब अंग्रेजों से असहयोग का अवसर आया, तो ठाटबाट वाली जिंदगी को छोड़ एक सूफी दरवेश की जिंदगी गुजारने लगे। वह अपनी कथनी और करनी में निडर और निष्कपट थे, बेबाक थे।
पटना के नजदीक सदाकत आश्रम उनकी निष्ठा, सेवा और कर्मठता का ही नतीजा है। अपनी इच्छानुसार वे वहां ज्यादा दिन नहीं रहे, उनके आश्रम की कल्पना ने विद्यापीठ के लिए एक स्थान उपलब्ध करा दिया। उनकी इस कोशिश ने दोनों समुदायों को एकता के सूत्र में बांध दिया। ऐसे कर्मठ व्यक्ति का अभाव हमेशा खटकेगा और आज जब देश जिस ऐतिहासिक मोड़ पर है, उनकी कमी का शिद्दत से एहसास होगा।’
राष्ट्रपिता की ये तमाम बातें इस बात की दलील हैं कि मौलाना मजहरुल हक ने आजादी के आंदोलन में किस तरह कंधे से कंधा मिलाकर निर्णायक योगदान दिया। लेकिन, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि शताब्दी समारोहों में उनका जिक्र तक नहीं आता। उनके योगदान को न तो कोई प्रसिद्धि मिली और न ही कोई उचित जगह।

Pin It