हिंसक होते आंदोलन और सरकारी तंत्र

सवाल यह है कि आंदोलन लगातार हिंसक क्यों हो रहे हैं? प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को मनवाने के लिए कानून को हाथ में क्यों ले रहे हैं? ऐसे हिंसक आंदोलनों से किसका नुकसान हो रहा है? क्या ऐसे प्रदर्शनों और आंदोलनों से निपटने के लिए सरकार के पास कोई कारगर रणनीति नहीं है?

आरक्षण विरोधियों का भारत बंद आंदोलन हिंसक हो गया। कई स्थानों पर आगजनी, पथराव और फायरिंग की गई। सबसे उग्र आंदोलन बिहार में हुआ। यहां बंद के विरोध और समर्थन करने वाले आमने-सामने आ गए। दोनों ओर से गोली चलायी गई। कई घायल हो गए। प्रदर्शनकारियों ने ट्रेनें रोक दीं। पंजाब में तलवारों से हमला किया गया। धारा 144 लागू होने के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने उत्पात मचाया। मध्य प्रदेश के दो जिलों में कफ्र्यू लगा दिया गया जबकि उत्तर प्रदेश के कई जिलों में पुलिस हाई अलर्ट पर रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंसा की आशंका को देखते हुए इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई। कई स्थानों पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। ये प्रदर्शनकारी जाति नहीं बल्कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था करने की मांग सरकार से कर रहे थे। सवाल यह है कि आंदोलन लगातार हिंसक क्यों हो रहे हैं? प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को मनवाने के लिए कानून को हाथ में क्यों ले रहे हैं? ऐसे हिंसक आंदोलनों से किसका नुकसान हो रहा है? क्या ऐसे प्रदर्शनों और आंदोलनों से निपटने के लिए सरकार के पास कोई कारगर रणनीति नहीं है? क्या सियासी दल हिंसक आंदोलनों को अंदरखाने बढ़ावा दे रहे हैं? क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस प्रकार के आंदोलन असंवैधानिक नहीं है?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी मांगों को लेकर आंदोलन और शांति पूर्ण धरना-प्रदर्शन को स्वीकृति प्राप्त हैं। बावजूद इसके कई बार आंदोलन हिंसक हो जाते हैं। यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। प्रदर्शनकारियों की भीड़ आंदोलन के दौरान न केवल निर्दोष लोगों को निशाना बनाते हैं बल्कि सरकारी और निजी संपत्ति का भी नुकसान करने से बाज नहीं आते हैं। 2 अप्रैल को एससी/एसटी एक्ट में बदलावों के खिलाफ दलित संगठनों ने भारत बंद बुलाया था। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में हिंसा भडक़ गई थी। इस दौरान करीब 10 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। इस आंदोलन के प्रतिक्रिया में आरक्षण विरोधियों ने हिंसक प्रदर्शन किया। सरकारी संपत्ति का नुकसान किया गया। यह सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ। प्रदर्शनकारियों को काबू करने में पुलिस नाकाम रही। पुलिस को यह भी पता नहीं चल सका कि आंदोलन कभी भी हिंसक रूप ले सकता है। हिंसक आंदोलनों से निपटने के लिए पुलिस के पास कोई कारगर रणनीति नहीं है। यही नहीं सियासी दल भी अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए भीड़ को भडक़ाने का काम करते हैं। दो अप्रैल के आंदोलन में सियासी दलों की भूमिका सामने आ रही है। ये आंदोलनकारी अपने ही देश की संपत्ति का नुकसान करते हैं। इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ता है। यदि सरकार आंदोलनों को हिंसक होने से रोकना चाहती है तो उसे कोई कारगर उपाय करना होगा।

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