साम्राज्यवादी चीन से तनातनी के मायने

सवाल यह है कि चीन इस तरह के विवाद अक्सर क्यों पैदा करता है? क्या साम्राज्यवादी चीन के ऐसा करने के पीछे कोई कूटनीतिक कारण है? क्या चीन, भारत को उलझा कर मालदीव में हस्तक्षेप करना चाहता है? क्या डोकलाम में पीछे हटने के बाद वह अरुणाचल में भारत को परेशान करने की चाल चल रहा है?

डोकलाम विवाद के बाद एक बार फिर भारत और चीन के बीच तनातनी बढऩे के आसार दिखने लगे हैं। इस बार अरुणाचल को लेकर तनाव पैदा हुआ है। सामरिक रूप से बेहद अहम अरुणाचल प्रदेश के आसफिला क्षेत्र में भारतीय सेना की पेट्रोलिंग को चीन ने अतिक्रमण करार दिया है। चीन के रुख से भारत हैरान है क्योंकि यह क्षेत्र भारत का है और भारतीय सेना यहां अरसे से पेट्रोलिंग करती आ रही है। सवाल यह है कि चीन इस तरह के विवाद अक्सर क्यों पैदा करता है? क्या साम्राज्यवादी चीन के ऐसा करने के पीछे कोई कूटनीतिक कारण है? क्या चीन, भारत को उलझा कर मालदीव में हस्तक्षेप करना चाहता है? क्या डोकलाम में पीछे हटने के बाद वह अरुणाचल में भारत को परेशान करने की चाल चल रहा है? क्या शी जिनपिंग के नेतृत्व वाला चीन भारत से दो-दो हाथ करने की तैयारी कर रहा है? क्या चीन को उसी की भाषा में जवाब देने का वक्त आ चुका है?
भारत और चीन के संबंध बड़े जटिल हैं। तमाम विवादों के बावजूद दोनों देशों के बीच 1962 को छोडक़र कोई बड़ा युद्ध नहीं हुआ। 73 दिनों तक चले डोकलाम विवाद के दौरान भी दोनों ओर से एक भी गोली नहीं चली। बावजूद चीन हमेशा भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की कोशिश करता रहा है। वह भारत के अक्साई चीन क्षेत्र को हड़प चुका है और अब उसकी निगाह अरुणाचल पर है। अरुणाचल के तवांग इलाके के बड़े हिस्से पर वह अपना दावा जताता रहा है। इस क्षेत्र में अक्सर चीनी और भारतीय सैनिक आमने-सामने आ जाते हैं। विस्तारवादी चीन के ऐसा करने के पीछे कोई एक कारण नहीं है। वह दक्षिण चीन सागर पर कब्जा करना चाहता है। मालदीव में भी वह भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। यहां वह हस्तक्षेप की कोशिश कर रहा है। वह पाकिस्तान के साथ पीओके में आर्थिक गलियारा बना रहा है। भारत इसका विरोध कर चुका है। चीन को लगता है कि यदि भारत का विरोध ज्यादा तेज हुआ तो उसे बड़ा घाटा उठाना पड़ेगा। वहीं नेपाल में चीन के प्रभाव को कम करने के लिए पिछले दिनों भारत ने अपने इस पड़ोसी देश को रेल, सडक़ व जलमार्ग की छह परियोजनाएं देने का ऐलान किया है। इससे भी वह परेशान है। यहां वह पावर प्रोजेक्ट लगाने की कोशिश कर रहा है। भारत के प्रयासों से उसकी नीति को धक्का लग सकता है। जाहिर है यदि विस्तारवादी चीन को रोकना है तो उसको उसी की भाषा में जवाब देना होगा। भारत को भी चाहिए कि वह तिब्बत और दक्षिण चीन सागर के मुद्दे को विश्व मंच से उठाए। तिब्बत के लाखों शरणार्थी भारत में रह रहे है। इसको मुद्दा बनाकर वह चीन को आसानी से घेर सकता है। यहां चीन मानवाधिकारों का जबरदस्त हनन कर रहा है। यदि भारत ऐसा करेगा तो इसका असर निश्चित रूप से चीन पर पड़ेगा और वह भारत में घुसपैठ की कोशिशों से बाज आएगा।

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