अब कैराना में होगा शह-मात का खेल रणनीति बनाने में जुटे सियासी दल

  • गोरखपुर व फूलपुर सीट पर सफलता मिलने के बाद सपा-बसपा के हौसले बुलंद
  • भाजपा भी चक्रव्यूह बनाने में जुटी, मजबूत प्रत्याशी खोजने में जुटी पार्टियां
  • कैराना के जातीय समीकरणों पर भी राजनीतिक दलों की नजर

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा को शिकस्त देने के बाद अब सपा-बसपा गठबंधन की नजर कैराना सीट पर है। वहीं भाजपा इस सीट पर पूरा जोर लगाने के मूड में है। रालोद भी इस सीट पर अपनी नजरे गड़ाए है। कैराना में जातीय समीकरणों को देखते हुए सपा-बसपा के साथ भाजपा ने भी दांव-पेच चलने शुरू कर दिए है। मजबूत प्रत्याशियों की खोज शुरू की जा चुकी है। भाजपा अब एक और हार स्वीकार करने के मूड में नहीं है क्योंकि गोरखपुर में मिली पराजय से प्रदेश की योगी सरकार की काफी किरकिरी हो चुकी है। जाहिर है इस सीट पर जमकर जोर आजमाइश होगी। हालांकि यहां की सीट जीतने के लिए भाजपा को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।
उपचुनाव में बसपा के समर्थन से बड़ी जीत हासिल करने वाली सपा के हौसले फिलहाल बुलंद हैं। 23 साल पुरानी दुश्मनी को भुलाकर साथ आए सपा-बसपा की नजर कैराना लोकसभा सीट पर है। यह सीट भाजपा सांसद हुकुम सिंह के निधन के कारण रिक्त हुई है। गोरखपुर और फूलपुर में जीत के बाद प्रदेश के सियासी समीकरण भी बदल चुके हैं। उपचुनाव में बसपा के समर्थन से मिली जीत के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बसपा सुप्रीमो मायावती से मुलाकात की थी। उन्होंने बसपा प्रमुख को जीत की बधाई दी। साथ ही दोनों नेताओं के बीच करीब 40 मिनट तक बातचीत हुई। 2017 विधानसभा चुनाव के बाद सपा के लिए ये पहली जीत है। माना जा रहा है कि सपा-बसपा मिलकर भाजपा को प्रदेश में रोक सकते हैं।
जाहिर है सपा-बसपा के साथ आने का अगला टेस्ट कैराना लोकसभा सीट पर होना है। इसी साल फरवरी में भाजपा सांसद, हुकम सिंह के निधन से यह सीट रिक्त हुई है। फूलपुर और गोरखपुर सीट सपा के पास आने के बाद अब कैराना में माना जा रहा है कि बसपा अपना उम्मीदवार उतार सकती है। ऐसे में बसपा उम्मीदवार को सपा समर्थन दे सकती है, जिस प्रकार फूलपुर और गोरखपुर में बसपा ने सपा उम्मीदवार को समर्थन किया था। दूसरी ओर बसपा इस बार कोई जल्दबाजी के मूड में नहीं है। वह लगातार फूंक-फूंककर गठबंधन के लिए कदम बढ़ा रही है। इसीलिए उत्तर प्रदेश की दोनों सीटों के उपचुनाव में समर्थन देकर उसने टेस्ट किया है। वहीं सपा की ओर से सकारात्मक परिणाम दिख रहे हैं, अखिलेश यादव ने जिस तरह से जीत का श्रेय बसपा को दिया है इससे मायावती का भी काफी गदगद है और उन्होंने पुराने जख्मों पर मरहम लगाकर भविष्य में आगे साथ चलने का रास्ता साफ कर दिया है।
गौरतलब है कि 1993 में मुलायम-कांशीराम ने गठबंधन करके राममंदिर लहर को रोककर भाजपा को सत्ता में आने नहीं दिया था। उसी तरह मोदी लहर को रोकने में अखिलेश और मायावती सफल हुए हैं। दोनों दलों के पास भाजपा को सूबे में रोकने के लिए पर्याप्त अंक गणित है। दोनों के पास मजबूत वोट बैंक है, जिसके बूते वे भाजपा को 2014 जैसा इतिहास दोहराने से रोकने की तैयारी कर रहे हैं। दोनों ही दल जातीय समीकरण के भरोसे लोकसभा चुनाव में अपनी नैया पार लगाने की जुगत में हैं।

आगामी लोकसभा चुनाव की भी तैयारी

2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए सपा और बसपा ने भले ही औपचारिक गठबंधन न किया हो, लेकिन दोनों ने भविष्य में एक साथ चुनावी समर में उतरने का मन बना लिया है। सूत्रों की माने तो सपा और बसपा बराबर सीट के साथ लोकसभा चुनाव में उतरने के लिए सहमत हो चुकी। ऐसे में सूबे की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 40-40 दोनों के खाते में आएंगी। आगामी लोकसभा चुनाव में दोनों एक साथ उतरते हैं, तो ऐसे में 2017 विधानसभा चुनाव के नतीजों के हिसाब से 57 सीटें सपा और बसपा के खाते में जाएगी। वहीं भाजपा को महज 23 सीटें मिलेगी, हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 71 सीटें उत्तर प्रदेश से जीती थी, जो अब घटकर 68 हो गई हैं जबकि कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव होना है।

कैराना में जातीय समीकरण

कैराना लोकसभा सीट गुर्जर बहुल सीट है। यहां लगभग 3 लाख गुर्जर हैं। खास बात यह है कि इनमें आधे मुस्लिम गुर्जर हैं। इस लोकसभा सीट पर 40 फीसदी मुस्लिम वोट हैं, जिसमें दलित ,जाट और अन्य वोटों के जुड़ जाने के बाद ज्यादा कुछ नहीं बचेगा। भाजपा को इस समीकरण में सेंध लगानी होगी।

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