संविधान के साथ खिलवाड़

जगदीप छोकर

हाल ही में पास हुए 2018 के फाइनेंस बिल में एक महत्वपूर्ण हिस्सा एफसीआरए (फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगूलेशन एक्ट 1976) के संशोधन का है। इसकी शुरुआत 2013 से शुरू होती है, जब यूपीए सरकार ने इलेक्टोरलर ट्रस्ट की एक नयी स्कीम लागू की थी, जिसमें सरकार ने कहा था कि चंदा देनेवाली कंपनियों और राजनीतिक दलों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी जायेगी, ताकि उनका आपस में कोई गठजोड़ न बन पाये क्योंकि कंपनियां अपने फायदे के लिए राजनीतिक दलों को सीधे चंदा देती थीं। उस दौरान दो बातें कही गयीं- एक तो यह कि इलेक्टोरल ट्रस्ट को चंदा देनेवालों को आयकर की छूट मिलेगी और दूसरी यह कि इलेक्टोरल ट्रस्ट को एक साल में जितना चंदा मिलेगा, उसका कम से कम 95 प्रतिशत राजनीतिक दलों को दे देना होगा। इसके बाद कई इलेक्टोरल ट्रस्ट बन गये। उनमें से एक ट्रस्ट का नाम सामने आया-पब्लिक एंड पॉलिटिकल अवेयरनेस ट्रस्ट, जो पता नहीं चल रहा था कि किसने बनाया है।
छानबीन से पता चला कि यह ट्रस्ट तीन कंपनियों ने मिलकर बनाया था। तीनों कंपनियां अलग-अलग जगह पर अलग-अलग धंधे में थीं और यूके में रजिस्टर्ड वेदांता रिसोर्सेज नामक कंपनी इनकी मालिक थी। तब हमें लगा कि पब्लिक एंड पॉलिटिकल अवेयरनेस ट्रस्ट का पैसा तो असलियत में वेदांता रिसोर्सेज का पैसा है, क्योंकि वेदांता रिसोर्सेज का इस पर पूरा नियंत्रण है। वहीं मार्च 2014 में दिल्ली हाइकोर्ट ने फैसला सुनाया कि बीजेपी और कांग्रेस ने विदेशी स्रोतों से चंदा लिया है, इसलिए इन्होंने एफसीआरए का उल्लंघन किया है। हाइकोर्ट ने भारत सरकार और चुनाव आयोग को आदेश दिया कि इन दोनों दलों पर एफसीआरए का उल्लंघन करने के लिए छह महीने के भीतर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन कुछ ठोस कार्रवाई नहीं हुई, और छह महीने से पहले ही दोनों दलों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी। इसी बीच कुछ संशोधन भी हो गये। वहीं जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, तब बीजेपी और कांग्रेस के वकीलों ने कहा कि अब तो एफसीआरए में विदेशी स्रोत की परिभाषा बदल गयी है, इसलिए इस केस का मतलब नहीं है।
दरअसल इस नये 2010 के एफसीआरए में साफ लिखा हुआ है कि इसके बनते ही 1976 का एफसीआरए कानून खत्म हो गया। चूंकि जिन चंदों के बारे में ये याचिका दायर की गयी है, वे 2009 और उससे पहले के हैं, जब एफसीआरए 2010 नहीं था, इसलिए इन पर फैसला एफसीआरए 1976 के तहत किया जायेगा। इसके बाद दोनों दलों के लोगों ने अपने बचाव की कोशिशें तेज कर दीं। तब भारत सरकार के गृह मंत्रालय को यह लिखा गया कि चूंकि अब दिल्ली हाइकोर्ट का फैसला पक्का हो गया है, तो जो कार्रवाई भाजपा-कांग्रेस के खिलाफ छह महीने में करनी थी, उसको तुरंत किया जाये। लेकिन, कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसलिए भारत सरकार के गृह मंत्रालय के खिलाफ अदालत की अवमानना का मुकदमा दायर किया गया, जो अभी चल रहा है। इसी बीच फरवरी 2018 का बजट आ गया, जिसमें यह लिखा हुआ था कि 1976 वाले एफसीआरए में भी संशोधन कर दिया गया है। अब सवाल उठता है कि एक कानून जो 2010 में खत्म हो गया था, उसमें संशोधन कैसे किया जा सकता है।
यह तो वही बात हो गयी कि एक आदमी की मौत के आठ साल बाद कहा जा रहा है कि उसका घुटना नया लगाया जायेगा। यह अनहोनी बात है कि जो कानून अस्तित्व में है ही नहीं, उसमें कोई बदलाव कैसे हो सकता है? इसके बारे में अदालत से पूछा जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि एफसीआरए के संशोधन को बतौर मनी बिल पास करना संवैधानिक तौर पर गलत है। संविधान में मनी बिल की परिभाषा साफ-साफ लिखी हुई है। वहीं कई दूसरे बिल भी आधे घंटे से कुछ ही ज्यादा समय में पास हो गये, और कई संशोधन भी थे, लेकिन संसद में किसी पर कोई चर्चा नहीं हुई। यह तो संविधान के साथ खिलवाड़ है। इन सब चीजों से स्पष्ट है कि राजनीतिक दल सिर्फ अपना फायदा देख रहे हैं, देश और देश की जनता का नहीं। अपने फायदे के लिए ये दल संविधान के प्रावधानों की भी अनदेखी कर रहे हैं।
भ्रष्टाचार से लडऩे की बात करनेवाले राजनीतिक दलों का इस तरीके से पेश आना दुखदायक है। राजनीतिक दलों के इस चतुर रवैये को जनता के रोष और न्यायपालिका के जरिये रोकना पड़ेगा, तभी हमारा लोकतंत्र और उसकी संस्थाएं बचेंगी।

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