नई गेहूं नीति, किसान और सिस्टम

अहम सवाल यह है कि क्या सरकार की मंशा के अनुरूप किसानों को लाभ मिल सकेगा? क्या सरकार किसानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त करा सकेगी? क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य को उठते-गिरते बाजार भाव के अनुपात में तय किया गया है? क्या खरीद केंद्रों पर नौकरशाही किसानों को लाभ देने में किसी प्रकार की कोताही नहीं करेगी?

प्रदेश सरकार ने किसानों को एक और तोहफा दिया है। कैबिनेट बैठक में नई गेहूं नीति को मंजूरी दी गई। नई नीति के तहत गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1735 रुपये प्रति कुंतल तय किया गया। यही नहीं सरकार ने किसानों को लाभ देने के लिए 40 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीद का लक्ष्य भी निर्धारित किया है। खरीद के लिए प्रदेश भर में 5500 खरीद केंद्र स्थापित किए जाने का निर्णय लिया गया है। साथ ही इस पूरी प्रक्रिया पर निगरानी रखने के लिए खाद्य आयुक्त के कार्यालय में कंट्रोल रूम स्थापित किया जाएगा। प्रदेश सरकार का यह फैसला निश्चित रूप से सराहनीय है बावजूद कुछ सवाल अभी भी हैं। अहम सवाल यह है कि क्या सरकार की मंशा के अनुरूप किसानों को लाभ मिल सकेगा? क्या सरकार किसानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त करा सकेगी? क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य को उठते-गिरते बाजार भाव के अनुपात में तय किया गया है? क्या खरीद केंद्रों पर नौकरशाही किसानों को लाभ देने में किसी प्रकार की कोताही नहीं करेगी? क्या किसान सरकार के समर्थन मूल्य से खुश हैं?
भारत एक कृषि प्रधान देश है। बावजूद किसानों की स्थिति बेहद खराब है। किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। लिहाजा वे कर्ज में डूब जाते हैं। जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है तो यहां भी किसानों की स्थिति कमोबेश देश के अन्य किसानों की ही तरह है। एक साल पहले प्रदेश सरकार ने किसानों के कर्ज माफी की घोषणा की थी। इसका फायदा हजारों किसानों को मिला। हालांकि कुछ सवाल भी उठे। बजट में भी किसानों को केंद्र में रखा गया। अब योगी सरकार ने गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की है। साथ ही यह भी तय किया है कि केंद्रों में गेहूं खरीद के 72 घंटे के अंदर किसानों के खातों में पैसा भेज दिया जाएगा। लेकिन किसानों को बिचौलियों ने बुरी तरह जकड़ रखा है। अधिकांश छोटे जोत के किसानों से ये बिचौलिए पहले ही औने-पौने दाम देकर खेतों में खड़ी फसल खरीद लेते हैं और उसे बाजार में ऊंचे दामों में बेचकर मोटा मुनाफा कमाते हैं। यही नहीं न्यूनतम समर्थन मूल्य को बाजार भाव के मुताबिक रखने से ही किसानों को फायदा होगा अन्यथा किसान को बस लागत मूल्य से थोड़ा ही लाभ हो सकेगा। क्रय केंद्रों पर किसानों के साथ नौकरशाही का व्यवहार बेहद खराब होता है। यहां कई दिनों तक किसान अपनी फसल का वजन कराने के लिए खड़ा रहता है। यदि वाकई सरकार किसानों का भला करना चाहती है तो उसे सबसे पहले बिचौलियों पर शिकंजा कसना होगा। साथ ही यह भी तय करना होगा कि योजना का सौ फीसदी लाभ किसानों को मिले।

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