गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के नतीजों ने कांग्रेस के लिए खड़ी की चुनौती

उपचुनाव में सपा-बसपा के लिए महज वोट कटवा साबित हुई कांग्रेस
पिछले वोट को भी बरकरार नहीं रख सकी पार्टी, गठबंधन में शामिल होने की बढ़ी मजबूरी

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव परिणाम ने प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। कांग्रेस की यह चुनौती आगामी लोकसभा चुनाव में गठबंधन के दबाव का सामना करने की है। समाजवादी पार्टी को बहुजन समाज पार्टी के समर्थन के बाद कांग्रेस की स्थिति वोट कटवा की रही। इसी के साथ यह बात भी साफ हो गयी कि प्रदेश में कांग्रेस हाल-फिलहाल अकेले दम पर चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है। उपचुनाव में दोनों सीटों पर पार्टी की जमानत जब्त होने से पार्टी के गठबंधन में शामिल होने और सीटों को लेकर सपा-बसपा के दबाव को बर्दाश्त करने की मजबूरी बढ़ गयी है।
लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस पिछले लोकसभा चुनाव में मिले वोट भी बरकरार नहीं रख सकी और दोनों क्षेत्रों में 20 हजार वोटों के अंदर सिमट कर रह गयी। वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को फूलपुर में 58 हजार और गोरखपुर में 45 हजार से अधिक वोट हासिल हुए थे, वहीं उपचुनाव में पार्टी गोरखपुर में लगभग 19 हजार और फूलपुर में 19 हजार से अधिक मत ही पा सकी। फूलपुर लोकसभा सीट कांग्रेस के लिए खासा महत्व रखती है, बावजूद इसके फूलपुर में कांग्रेस निर्दल प्रत्याशी अतीक अहमद से भी कम वोट हासिल कर सकी। फूलपुर लोकसभा सीट पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का संसदीय क्षेत्र रहा है। बीते विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ हुए गठबंधन के बावजूद भी कांग्रेस ने अपना अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया और महज 7 सीट ही जीत सकी। हालांकि यहां यह भी गौर करने लायक है कि सपा और बसपा दोनों ही दल यूपीए का हिस्सा हैं और राष्टï्रीय स्तर पर कांग्रेस ही बड़ी पार्टी है। ऐसे में कांग्रेस अगर प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के दबाव में सपा-बसपा के लिए अधिक सीटें छोड़ कर गठबंधन भी करती है तो संख्या बल के लिहाज से लोकसभा चुनाव में मजबूत स्थिति में आ सकती है। ताजा स्थितियों को देखते हुए कांग्रेस ज्यादा दिनों तक एकला चलो की स्थिति में नहीं दिखाई पड़ रही है। प्रदेश की राजनीति में अपनी जमीन मजबूत करने के लिए उसे सपा-बसपा के साथ गठबंधन की राह तय करनी पड़ सकती है। हालांकि अभी तक गठबंधन को लेकर कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। सूत्रों का कहना है कि अंदरखाने कांग्रेस के वरिष्ठï नेता यूपी के बदलते समीकरण पर मंथन कर रहे हैं। सारे समीकरण देखने के बाद ही वे अगला कदम उठाएंगे।

राज्यसभा चुनाव पर भी होगा उपचुनाव के नतीजों का असर

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव का परिणाम प्रदेश में 10 सीटों के लिये होने वाले राज्यसभा चुनाव पर भी असर डाल सकता है। यह परिणाम निर्दलीय विधायकों पर खासा असर छोड़ सकता है। वहीं सत्ता पर काबिज भाजपा भी ऐसे वोटरों पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेगी, जो किन्ही वजहों से छिटक सकते हैं। 47 सदस्यों वाली सपा के पास भी अपने एक उम्मीदवार की जिताने के बाद 10 विधायक अतिरिक्त होगे, अगर नरेश अग्रवाल के पुत्र नितिन अग्रवाल सपा का साथ छोड़ भी देते हैं तो सपा के पास 9 विधायक अधिक होंगे। प्रदेश की बदली हुई मौजूदा राजनीति का असर बसपा के एक मात्र उम्मीदवार पर केन्द्रित हो सकती है। वादे के मुताबिक सपा उसका समर्थन करेगी और बसपा प्रत्याशी को जिताने का भी प्रयास करेगी। इसी के साथ कांग्रेस के 7 विधायकों का भी साथ बसपा उम्मीदवार को मिलेगा। राज्यसभा चुनाव में बसपा को 37 विधायकों की जरूरत है, लेकिन उसके पास कुल 19 विधायक ही हैं, अगर सपा और कांग्रेस के सदस्यों को भी जोड़ दें तो भी बसपा को कुछ अन्य वोटों की दरकार होगी। अगर नितिन अग्रवाल सपा छोडक़र नहीं जाते है तो राष्ट्रीय लोकदल के एक सदस्य से बसपा की राह आसान हो जाएगी।

सत्ता पक्ष की ओर रहा है निर्दलीय विधायकों का झुकाव
पिछले चुनावों पर नजर डालें तो अधिकतर निर्दलीय विधायकों का झुकाव सत्ता पक्ष की तरफ ही होता है। लेकिन उप चुनाव का परिणाम निर्दलीय विधायकों का मन डोल सकता है। विधानसभा में कुल चार निर्दलीय विधायक है, जिसमें बाहुबली विधायक राजा भैया महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि विजय मिश्रा अखिलेश यादव से नाराज है, अमनमणि त्रिपाठी का टिकट भी सपा काट चुकी है। ऐसे में उप चुनाव का परिणाम राज्यसभा चुनाव में इन निर्दलीय विधायकों पर कितना असर डालता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।

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