ट्रामा-2 में इलाज के लिए मरीजों को करना होगा और इंतजार, लिवर ट्रांसप्लांट की योजना भी अटकी

केजीएमयू से हैंडओवर के बाद ट्रामा में इलाज पड़ा है ठप
एसजीपीजीआई के जिम्मेदार बस दे रहे हैं आश्वासन

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। ट्रामा-2 में इलाज के लिए मरीजों को अभी और इंतजार करना होगा। बिल्डिंग बन जाने के बावजूद एसजीपीजीआई यहां अभी तक मरीजों का इलाज नहीं शुरू कर सका है। संस्थान के अधिकारियों का कहना है कि इसे शुरू करने में तमाम अड़चनें हैं और इसकी शुरुआत करने में अभी एक साल और लग सकता है।
पीजीआई की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक 218 बेड के अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस अपेक्स ट्रॉमा सेंटर का निर्माण 2006 में शुरू हुआ था। इसे तीन वर्ष में पूरा किया जाना था लेकिन इसके निर्माण में दस साल लग गए। एक जनवरी 2016 को इसे केजीएमयू को देकर शुरू किया गया। केजीएमयू के संसाधनों पर यहां 800 से अधिक मरीजों की सर्जरी भी की गई और 2800 से अधिक को इलाज दिया गया। 2017 में सरकार बदलने के साथ ही इसे फिर पीजीआई के हवाले कर दिया गया। जिसके बाद से यहां इलाज ठप है। अधिकारियों के मुताबिक फिलहाल अगले एक साल तक यहां ट्रीटमेंट शुरू हो पाना मुमकिन नहीं है। यही नहीं यहां 13 वर्ष से लिवर ट्रांसप्लांट की योजना भी ठप पड़ी है। यह प्रोजेक्ट 2005 में बनना शुरू हुआ था। 30 करोड़ रुपए की लागत से बिल्डिंग बना ली गई है, लेकिन अभी तक यह मरीजों के लिए उपलब्ध नहीं है। न ही यहां मशीनें आई हैं। पीजीआई प्रशासन और संबंधित अधिकारियों ने बिल्डिंग बनने के बावजूद इसमें रुचि नहीं ली, जिससे मरीज लिवर ट्रांसप्लांट के लिए दिल्ली, बंगलौर जैसे शहरों में जाने को मजबूर हैं।

क्या कहते हैं जिम्मेदार

एसजीपीजीआई के डायरेक्टर प्रोफेसर राकेश कपूर का कहना है कि 473 करोड़ का लोन मिला है, जिससे रीनल ट्रांसप्लांट, लिवर ट्रांसप्लांट, रोबोटिक सर्जरी, इमरजेंसी मेडिसिन शुरू होनी है। लिवर ट्रांसप्लांट की बिल्डिंग रेडी है। एक्विपमेंट करीब 38 करोड़ के हैं। कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी को इसी वर्ष शुरू किया जाएगा। लाइब्रेरी शिफ्ट कर दी गई है। एचआईएस को न्यू लाइब्रेरी में शिफ्ट किया जा रहा है। एनिमल हाउस एक्टीवेटेड है। रीजनल कैंसर सेंटर के लिए अभी हमें मशीन खरीदने के लिए स्टेट शेयर मिला है। मशीनें खरीदी जा रही हैं। टेंडर कर दिया गया है। ट्रॉमा सेंटर मैनपॉवर की कमी से रुका है।

कई और प्रोजेक्ट भी नहीं हुए शुरू

रेडियोथेरेपी डिपार्टमेंट को रीजनल कैंसर सेंटर के रूप में तब्दील किया जाना था। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की मदद से यह सेंटर शुरू होना था। इसके लिए पहले फेज में पांच करोड़ रुपए भी 2005 में ही स्वीकृत कर दिए गए, लेकिन न तो मशीनें आईं और न ही कैंसर के मरीजों को सुविधाएं मिलीं। इसके अलावा पीजीआई के हॉस्पिटल इनफॉर्मेशन सिस्टम को 2008 में अपग्रेड करने की प्रक्रिया शुरू की गई। इस सिस्टम पर ही मरीज रजिस्टर और भर्ती होते हैं। उनकी जांच व इलाज से लेकर पूरा ब्यौरा ऑनलाइन रहता है। अपग्रेडेशन के लिए संबंधित एजेंसी को 12.50 करोड़ रुपए दिए गए लेकिन अभी भी परचेज माड्यूल, एक्विपमेंट इनवेंटरी, हाउस कीपिंग सर्विसेज, अकाउंट, ड्रग लाइब्रेरी सहित अन्य सुविधाओं को इससे जोड़ा नहीं गया।

कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी और लाइब्रेरी का हाल

23 करोड़ की लागत से इसका निर्माण शुरू हुआ। पांच वर्ष का प्रोजेक्ट था लेकिन 2009 में नौ वर्ष बाद यह पूरा हो सका। उसके बाद से अब तक न तो फैकल्टी का चयन किया गया और न ही कोई कोर्स चलाया गया। संस्थान ने बिल्डिंग के एक हिस्से में कॉलेज ऑफ नर्सिग शुरू किया। अगर यहां कई कोर्स चलाए जाते तो युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिल सकते थे।
18 करोड़ की लागत से इसका निर्माण शुरू हुआ। इसे तीन वर्ष में पूरा होना था, लेकिन 12 वर्ष बाद (2017) इसका कांस्ट्रक्शन पूरा हो सका। तीन फ्लोर पर लाइब्रेरी बनी और शेष को हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन व एचआईएस को दे दिया गया। इस दौरान लाइब्रेरी के लिए लाए गए करोड़ों के फर्नीचर को उखाडक़र हटा दिया गया।
रिसर्च, ट्रेनिंग, एडवांस सर्जिकल तकनीक विकसित करने के लिए पीजीआई में एनिमल हाउस 2006 में बनना शुरू हुआ। 9 वर्ष बाद 2015 में 27 करोड़ की लागत से बिल्डिंग वर्क पूरा हुआ लेकिन सुविधाएं अभी तक पूरी नहीं हैं। विश्व स्तरीय रिसर्च वर्क का उद्देश्य अभी आंशिक रूप से ही पूरा हो पा रहा है।

हिमैटोलॉजी/बोन मैरो ट्रांसप्लांट ब्लॉक के लिए 18 करोड़ की लागत से वर्ष 2003 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ। इसे तीन वर्ष में पूरा होना था। 13 वर्ष बाद 2016 में बिल्डिंग का निर्माण पूरा हुआ लेकिन विभाग ने इसे अभी आंशिक रूप से ही अपने कब्जे में लिया है। सूत्रों के मुताबिक निर्माण में जमकर घोटाले किए गए जिसकी जांच के लिए कई बार कमेटियां बनीं लेकिन कमेटियों की रिपोर्ट अब तक नहीं आई।

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