इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने

सवाल यह उठता है कि कोर्ट के इस फैसले का समाज पर क्या असर पड़ेगा? क्या इस फैसले से उन लोगों को राहत मिल जाएगी जिनके परिजन वर्षों से कोमा में पड़े अपनी अंतिम घडिय़ां गिन रहे हैं? क्या इसका असर परिजनों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ेगा? क्या यह फैसला सम्मानपूर्वक जीने के साथ गरिमापूर्ण मौत का पर्याय बन सकेगा?

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी। साथ ही इसके लिए जरूरी गाइड लाइंस भी तय कर दी है। फैसले के मुताबिक मौत की कगार पर पहुंच चुके लोगों को वसीयत (लिविंग विल)के आधार पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेसिया) दी जा सकेगी। हालांकि कोर्ट ने साफ किया है कि लिविंग विल पर मरीज के परिवार की स्वीकृति जरूरी होगी। साथ ही हाईकोर्ट द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड तय करेगा कि मरीज को पैसिव यूथेनेसिया की जरूर है या नहीं। सवाल यह उठता है कि कोर्ट के इस फैसले का समाज पर क्या असर पड़ेगा? क्या इस फैसले से उन लोगों को राहत मिल जाएगी जिनके परिजन वर्षों से कोमा में पड़े अपनी अंतिम घडिय़ां गिन रहे हैं? क्या इसका असर महंगा इलाज करा रहे परिजनों की आर्थिक स्थिति पर पड़ेगा? क्या यह फैसला सम्मानपूर्वक जीने के साथ गरिमापूर्ण मौत का पर्याय बन सकेगा? क्या इसका दुरुपयोग नहीं होगा?
भारत में इच्छा मृत्यु को मंजूरी देने की मांग अरुणा शानबाग केस के बाद उठी। 42 साल तक कोमा में रहने के बाद उनकी मृत्यु 2015 में हो गई थी। 2011 में उनके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करते हुए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी। लेकिन कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था। हालांकि कोर्ट ने कहा था कि परिवार की इजाजत पर किसी को भी इच्छा मृत्यु दी जा सकती है। वहीं एनजीओ कॉमन कॉज ने लिविंग विल का हक देने की मांग को लेकर कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका में कहा गया था कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को लिविंग विल बनाने का अधिकार होना चाहिए। इस मामले को पांच जजों की बेंच के पास भेज दिया गया था। केंद्र ने इस मुद्दे पर दलील दी थी कि इच्छा मृत्यु पर सरकार सारे पहलुओं पर गौर कर रही है और इस मामले में सुझाव भी मांगे गए हैं। केंद्र ने लिविंग विल का विरोध किया था। लेकिन केंद्र की दलीलों को दरकिनार कर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को इजाजत दे दी। कोर्ट को इस बात का भी अंदेशा था कि इसका दुरुपयोग हो सकता है लिहाजा कोर्ट ने इस पर खुद निगरानी रखने की बात स्वीकार की है। कोर्ट ने माना कि लोगों को सम्मानपूर्ण तरीके से मरने का अधिकार मिलना चाहिए। जाहिर है कोर्ट के फैसले से उन लोगों को राहत मिलेगी, जिनके परिजन मेडिकल सपोर्ट सिस्टम के जरिए जिंदा रखे गए है और इसके लिए कई लोगों को अपने घर और जमीनें तक बेचनी पड़ रही हैं। हां इसका दुरुपयोग न हो इसलिए इस पर कड़ी नजर रखनी होगी वरना कुछ लोग इसका बेजा फायदा उठा सकते हैं।

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