शराब की दुकानों की नीलामी न होने से सरकार की खराब हुई साख, धीरज साहू की लापरवाही ने चौपट कर दिया आवास विकास और आबकारी विभाग

नौकरशाही में हैरानी है कि धीरज साहू जैसे अफसर को कैसे दे दिए इतने महत्वपूर्ण विभाग
आज तक जहां रहे हैं वहां विवादित रहे हैं धीरज साहू
शराब की दुकानों की नीलामी की प्रक्रिया को लेकर पहले दिन से उठ रहे हैं सवाल
पूरे सूबे में धड़ल्ले से बिक रही है ओवर रेट की शराब

४पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। लंबे समय से शराब की दुकानों की नीलामी की तैयारी कर रहा आबकारी विभाग ऐन मौके पर फेल नजर आया। आबकारी विभाग और एनआईसी की आधी अधूरी तैयारियों का खामियाजा प्रदेश के लाखों आवेदकों को भुगतना पड़ा जिन्होंने प्रदेश में शराब, बियर और मॉडल शॉप के आवंटन के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था। एनआईसी की लापरवाही की शिकायत शराब एसोसिएशन ने आबकारी आयुक्त धीरज साहू से पहले भी की थी मगर उन्होंने एनआईसी को भरोसेमंद बताते हुए उसी से काम लेना उचित समझा।
आबकारी आयुक्त की इस कार्यशैली के चलते पूरे प्रदेश में सरकार की खासी किरकिरी हुई, इतना ही नहीं आबकारी आयुक्त धीरज साहू अपनी कार्यशैली के चलते किसी को भी जवाब नहीं दे सके और पूरे मामले में नाकामी का ठीकरा एनआईसी के सिर पर फोड़ दिया। इनके पास आवास आयुक्त का भी चार्ज है और धीरज साहू की कार्यशैली पर हमेशा से ही सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि धीरज साहू की कार्यशैली के चलते कोई भी कर्मचारी और इंजीनियर उनके साथ काम करने को तैयार नहीं होता है। लापरवाही के चलते आबकारी विभाग को पहले चरण की ई-लॉटरी स्थगित करने के साथ ही दूसरे चरण की शुरू होने वाली प्रक्रिया को भी रोकना पड़ा। दिन भर इंतजार करने के बाद देर रात ९:३० बजे एनआईसी द्वारा ऑनलाइन शराब की दुकानों के आवंटन को तैयार सॉफ्टवेयर पर जिलों का डाटा लॉगिन न होने से लॉटरी की प्रक्रिया स्थगित कर दी गई।
लॉटरी के इंतजार में बैठे आवेदकों ने लखनऊ सहित कई जिलों में हंगामा काटा और सीएम के खिलाफ नारेबाजी की। लॉटरी के मद्देनजर अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के अधिकारियों को सभी ७५ जिलों में पर्यवेक्षक बनाकर भेजा गया था। लखनऊ की बात करें तो यहां गन्ना संस्थान में लाटरी के जरिए दुकानों का आवंटन होना था। सुबह १० बजे से गन्ना संस्थान में जिला आबकारी अधिकारी अपनी और एनआईसी की टीम के साथ पहुंच गए थे। भारी संख्या में आवेदक होने के कारण हाल के साथ ही बाहर भी दो बड़े एलईडी लगाए गए थे। अधिकारियों के मुताबिक ११ बजे सभी जिलों को एनआईसी का लिंक मिलना था जिसके जरिए लॉटरी होनी थी। तय समय सीमा बीतने के बाद भी जब जिलों में अधिकारियों को लिंक नहीं मिला तो उन्होंने योजना भवन से संपर्क किया जानकारी मिली कि सॉफ्टवेयर पर जिला डाटा लॉगिन नहीं हो रहा है। लंबे इंतजार के बाद जब आवेदकों ने हंगामा शुरू किया तो लॉटरी का समय बढ़ाया जाने लगा पहले दो फिर तीन और बाद में पांच फिर रात नौ बजे कर दिया गया। समाजवादी युवजन सभा के प्रदेश सचिव विजय मिश्रा का कहना है कि भाजपा के एक बड़े नेता शराब की दुकानों की डील कराने में जुटे थे। कामयाब न होने के कारण पूरी नीलामी टाल दी गयी। शराब की दुकानों के पीछे करोड़ों की डील की जा रही है।

कागजों तक सीमित प्रधानमंत्री आवास योजना

आवास विकास परिषद में धीरज साहू की तैनाती के बाद परिषद के विकास कार्यों में सीधा असर देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री आवास के तहत गरीबों के लिए बनाए जाने वाले मकानों की योजना अभी तक कागजों तक सीमित है। आवंटियों के लिए अधिक कीमत के फ्लैटों की भरमार है जिनकी बिक्री ठप है। अधिक कीमत व जरूरत से ज्यादा फ्लैट बनाने के कारण फ्लैट बिक नहीं रहे। इस मामले में लम्बे समय से जांच चल रही है जो कि अभी तक पूरी नहीं हो सकी हैं। जिसका सीधा असर परिषद के काम-काज पर पड़ रहा है।

लाटरी का समय दिन में कई बार बढ़ाने के बाद भी नहीं हो सकी। आवेदक सुबह से ही भूखे प्यासे गन्ना संस्थान में मौजूद रहे। एनआईसी की शिकायत आवेदन के समय ही हम लोगों ने आयुक्त सहित अन्य अधिकारियों से की थी। ऐन वक्त पर साफ्टवेयर धोखा दे गया और लोगों को इससे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

कन्हैया लाल मौर्य महामंत्री शराब एसोसिएशन

सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की इजाजत, तय की गाइड लाइंस
याचिका की सुनवाई पर सुनाया बड़ा फैसला, कहा, सम्मान से मरने का भी होना चाहिए अधिकार

४पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने लिविंग विल यानी इच्छा मृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने लिविंग विल में पैसिव यूथेनेशिया को इजाजत दी है। साथ ही सुरक्षा उपायों के लिए गाइडलाइन भी जारी की है। कोर्ट ने ऐसे मामलों में भी गाइडलाइन जारी की जिनमें एडवांस में ही लिविंग विल नहीं है। इसके तहत परिवार का सदस्य या दोस्त हाईकोर्ट जा सकता है और हाईकोर्ट मेडिकल बोर्ड बनाएगा। यह बोर्ड तय करेगा कि पैसिव यूथेनेशिया की जरूरत है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि ये गाइडलान तब तक जारी रहेंगी जब तक कानून नहीं आता।
सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने कहा था कि राइट टू लाइफ में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार शामिल है। हम ये नहीं कहेंगे। हम ये कहेंगे कि गरिमापूर्ण मृत्यु पीड़ारहित होनी चाहिए। कुछ ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए जिसमें गरिमापूर्ण तरीके से मृत्यु हो सके। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि हम ये देखेंगे कि इच्छामृत्यु के लिए वसीहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हो जिसमें दो स्वतंत्र गवाह भी हों।
कोर्ट इस मामले में पर्याप्त सेफगार्ड देगा। इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। संवैधानिक पीठ ने ये भी सवाल उठाया था कि क्या सम्मान से जीने के अधिकार को माना जाता है तो क्यों न सम्मान के साथ मरने को भी माना जाए। क्या किसी व्यक्ति को उसके मर्जी के खिलाफ कृत्रिम सपोर्ट सिस्टम पर जीने को मजूबर कर सकते है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि आजकल मध्यम वर्ग में वृद्ध लोगों को बोझ समझा जाता है ऐसे में इच्छामृत्यु में कई दिक्कतें हैं।

क्या था मामला
फरवरी २०१५ में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की एक याचिका को संविधान पीठ में भेज दिया था जिसमें ऐसे व्यक्ति की बात की गई थी जो बीमार है और मेडिकल ओपीनियन के मुताबिक उसके बचने की संभावना नहीं है। तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सदाशिवम की अगुवाई वाली बेंच ने ये फैसला कॉमन कॉज की याचिका पर लिया था जिसमें कहा गया था कि एक व्यक्ति मरणांतक बीमारी से पीडि़त हो तो उसे दिए गए मेडिकल सपोर्ट को हटाकर पीड़ा से मुक्ति दी जानी चाहिए जिसे पैसिव यूथेनेशिया कहा जाता है।

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