फिर तीसरे मोर्चे की कवायद और आशंकाएं

असली सवाल यह है कि क्या वाकई तीसरे मोर्चे का गठन हो पाएगा? क्या ममता लोकसभा चुनाव से पहले विभिन्न दलों के नेताओं को किसी मोर्चे के गठन पर राजी करने में सफल हो पाएंगी? क्या अन्य दलों के नेता अपनी महत्वाकांक्षाओं को छोडक़र ममता का साथ दे सकेंगे? क्या फेडरल फं्रट के गठन की कवायद भाजपा को पूर्वोत्तर राज्यों में मिली सफलता से विपक्षी दलों में उपजे डर का परिणाम है?

देश में एक बार फिर तीसरे मोर्चे की कवायद शुरू हो गई है। इस बार यह कवायद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा का रथ रोकने के लिए फेडरल फ्रंट बनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। यही नहीं ममता ने सार्वजनिक मंच से भाजपा को ललकारते हुए यहां तक कह दिया कि यदि बंगाल को टॉरगेट किया तो दिल्ली भी जाएगी। असली सवाल यह है कि क्या वाकई तीसरे मोर्चें का गठन हो पाएगा? क्या ममता लोकसभा चुनाव से पहले विभिन्न दलों के नेताओं को किसी मोर्चे के गठन पर राजी करने में सफल हो पाएंगी? क्या अन्य दलों के नेता अपनी महत्वाकांक्षाओं को छोडक़र ममता का साथ दे सकेंगे? क्या फेडरल फं्रट के गठन की कवायद भाजपा को पूर्वोत्तर राज्यों में मिली सफलता से विपक्षी दलों में उपजे डर का परिणाम है? क्या ममता को अब अपनी गद्दी जाने का डर सताने लगा है या फिर वह वाकई तीसरे मोर्चे को लेकर गंभीर है?
दरअसल, पूर्वोत्तर में भाजपा को मिली सफलता ने ममता का सिंहासन हिला दिया है। पश्चिम बंगाल में हुए निकाय चुनाव में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन ही नहीं किया बल्कि दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी है। भाजपा का अगला निशाना पश्चिम बंगाल और कर्नाटक है। लगातार मिल रही विजयों से भाजपा के हौसले बुलंद हैं और वह रणनीति बनाकर पश्चिम बंगाल का चुनाव लडऩे की तैयारी कर रही है। वहीं ममता भले ही निकाय चुनाव में सफल रहीं हों लेकिन उन्होंने कोई बड़ा जनहितैषी काम नहीं किया। पश्चिम बंगाल में बेरोजगारी, गरीबी और अपराधों को नियंत्रित करने में भी वे सफल नहीं हो सकी हैं। वे दुर्गापूजा समेत कई मामलों में लिए गए निर्णयों के कारण भी विवादित रही हैं। निकाय चुनाव परिणामों ने ममता के प्रति जनता में असंतोष का संकेत दे दिया है। भाजपा इसी को भुनाने में जुटी है। हालांकि यहां वामदल भी वापसी के लिए जोर आजमाइश कर रहे हैं। जाहिर है तीसरे मोर्चे की बात कर ममता पश्चिम बंगाल से भाजपा का ध्यान भंग करना चाहती हैं। उनकी नजर भाजपा विरोधी दलों पर टिकी है। आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिए जाने से टीडीपी भाजपा से नाराज है और उसके दो मंत्रियों ने केंद्र से इस्तीफा दे दिया है। यूपी में बसपा ने लोकसभा उपचुनाव में सपा को खुला समर्थन दिया है हालांकि दोनों के बीच गठबंधन नहीं हुआ है। इन ताजा घटनाक्रमों पर ममता की नजर है और वे इन दलों के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करेगी। हालांकि इसके पूर्व भी भाजपा को घेरने के लिए महागठबंधन बनाने के असफल प्रयास हुए हैं। विभिन्न दलों के नेताओं की महत्वाकांक्षा इसके आड़े आ गईं। साफ है ममता का यह प्रयास कितना सफल होगा यह तो भविष्य में पता चलेगा। बावजूद इसके फेडरल फ्रंट का गठन आसान नहीं होगा।

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