राजनीति का चरित्र नहीं बदला

नवीन जोशी

त्रिपुरा, नगालैंड व मेघालय के चुनाव नतीजों से भाजपा का सही अर्थों में अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त करना, बंगाल-तेलंगाना-आंध्र-महाराष्ट्र से भाजपा-विरोधी राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की सुगबुगाहट और उत्तर प्रदेश के उप-चुनावों में भाजपा को हराने के लिए धुर-विरोधी सपा-बसपा का साथ आना, तीनों बातें एक साथ हुई हैं। यह सिर्फ संयोग है या राष्ट्रीय राजनीति की प्रवृत्तियों की पुनरावृत्ति का प्रतीक?
भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर आज वहां विराजमान है, जहां लंबे समय तक कांग्रेस का कब्जा रहा। कभी उत्तर भारत के कुछ राज्यों तक सीमित भाजपा, दक्षिण भारत से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों तक अपना परचम फहरा चुकी है, जहां कभी मतदाता उसका नाम भी नहीं जानते थे। हाल तक माना जाता था कि कांग्रेस की अखिल भारतीयता का मुकाबला भाजपा नहीं कर सकती। आज परिदृश्य हमारे सामने है। पहचान के रूप में कांग्रेस की राष्टï्रीय व्याप्ति भले हो, राजनीतिक सत्ता के तौर पर वह देश के कुछेक कोनों में सिमट कर रह गयी है। अब चंद राज्यों को छोड़ पूरे देश में भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता में है लेकिन इसी के साथ भाजपा के विरोध में आवाज भी उठने लगी हैं। रोचक यह कि विरोध में उठ रहे ये स्वर ठीक वैसे ही हैं, जैसे कभी केंद्र की कांग्रेस सरकारों के खिलाफ उठा करते थे। विरोध करनेवालों में कुछ तो एनडीए गठबंधन में हैं और केंद्र सरकार में उनकी भागीदारी भी है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने कुछ दिन पहले राष्ट्रीय स्तर पर गैर-भाजपाई-गैर-कांग्रेसी तीसरे मोर्चे की वकालत की, तो ममता बनर्जी ने ही नहीं, तेलुगू देशम और शिव सेना के नेताओं ने भी उनसे सहमति जतायी। तेलुगू देशम और शिव सेना एनडीए में शामिल हैं। टीआरएस के नेता और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने ‘जनता का तीसरा मोर्चा’ बनाने की पहल इसलिए की है कि वे ‘संघीय सहकार और आजादी’ चाहते हैं। उनका कहना है कि केंद्र सरकार को विदेशी मामले, रक्षा, आदि राष्ट्रीय मामले देखने चाहिए। अन्य मुद्दे राज्यों पर छोड़ देने चाहिए। इस मामले में वे कांग्रेस के विरोधी भी हैं इसलिए भाजपा और कांग्रेस दोनों को छोडक़र क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय विकल्प बनाने की बात कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने तत्काल चंद्रशेखर राव को फोन करके समर्थन जताया। राज्यों को ज्यादा आर्थिक और प्रशासनिक आजादी की समर्थक तो वे हैं ही, उनकी चिंता बंगाल में अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाना ज्यादा बड़ा मुद्दा है। त्रिपुरा में वाम-दुर्ग ढहानेवाली भाजपा अब बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी है। वाम दल लगातार हाशिये पर जा रहे हैं। बंगाल के हाल के उप-चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर भाजपा ही थी इसलिए भाजपा-विरोधी मोर्चे को हवा देना ममता की राजनीतिक जरूरत भी है।
तेलुगू देशम कुछ समय से केंद्र सरकार से नाराज है। उसकी शिकायत है कि आंध्र प्रदेश के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। केंद्रीय बजट में आंध्र को विशेष कुछ नहीं मिला। यह ठीक वैसी ही शिकायत है, जैसी तेलुगू देशम समेत कई क्षेत्रीय दल केंद्र की कांग्रेस सरकारों से किया करते थे। तब कांग्रेस उन्हें मनाने में लगी रहती थी। आज भाजपा मना रही है। शिवसेना की भाजपा से नाराजगी पुरानी व भिन्न किस्म की हैं। मूल मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में वर्चस्व का है। पहले शिवसेना गठबंधन पर भारी पड़ती थी। भाजपा के राष्ट्रीय उभार के बाद शिव सेना पर वह भारी पड़ गयी। यूपी में दो लोकसभा उप-चुनावों और राज्यसभा चुनाव के लिए सपा और बसपा का साथ आना चौंकानेवाली घटना है। 1993 में दोनों के चुनावी गठबंधन ने ‘राम मंदिर लहर’ पर सवार भाजपा को सत्ता पाने से वंचित कर दिया था लेकिन, 1995 में ये रिश्ते मार-पीट तक पहुंच गये थे। तब से आज तक राजनीतिक दुश्मनी बनी रही। दोनों में फिलहाल अल्पकालिक समझौता हुआ है, तो इसका कारण भी भाजपा को रोकना है, ताकि अपना अस्तित्व बना रहे। क्या विभिन्न राज्यों से उठ रही भाजपा-विरोधी इन आवाजों के राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा मोर्चा बनने की संभावना है? फिलहाल ऐसा नहीं लगता। जैसे कभी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस-विरोधी राजनीति की संभावना बनी रहती थी, वैसे ही आज भाजपा-विरोधी राजनीति की जगह बन गयी है। इस जगह को अखिल भारतीय पहचान वाली कांग्रेस भर सकती थी, लेकिन वह अपने ही को बटोर नहीं पा रही। मजेदार बात यह है कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस की जगह भाजपा के ले लेने पर भी राजनीति का चरित्र बिल्कुल नहीं बदला है। दक्षिण और पूर्वोतर भारत के हाल के उदाहरण बताते हैं कि भाजपा ठीक वैसे ही जोड़-तोड़ कर रही है, जैसे कांग्रेस करती थी। राजनीतिक प्रेक्षक इस पर एक मत हैं कि भाजपा का कांग्रेसीकरण हो चुका है।

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