महिला दिवस की सार्थकता और सवाल

सवाल यह है कि क्या वर्ष में एक बार महिला सशक्तीकरण की बात उठा देने भर से भारत की महिलाओं का यथार्थ बदल जाएगा? क्या महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी प्रयास काफी हैं? क्या समाज में व्याप्त सामंती सोच खत्म हो जाएगी? क्या महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, अपराध और शोषण की प्रवृत्ति समाप्त हो जाएगी?

आज पूरे विश्व में अंतरराष्टï्रीय महिला दिवस जोर-शोर से मनाया जा रहा है। भारत में भी सम्मेलनों और संगोष्ठिïयों का दौर चल रहा है। महिलाओं के हक की लड़ाई लडऩे का संकल्प लिया जा रहा है। महिलाओं की आजादी, स्त्री-पुरुष समानता, आर्थिक स्वतंत्रता और सशक्तीकरण का मुद्दा एक बार फिर गंूज रहा है। सवाल यह है कि क्या वर्ष में एक बार महिला सशक्तीकरण की बात उठा देने भर से भारत की महिलाओं का यथार्थ बदल जाएगा? क्या महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी प्रयास काफी हैं? क्या समाज में व्याप्त सामंती सोच खत्म हो जाएगी? क्या महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, अपराध और शोषण की प्रवृत्ति समाप्त हो जाएगी? क्या देश में भू्रण और दहेज हत्याओं का सिलसिला समाप्त हो जाएगा? क्या समाज में पुरुषों की भांति महिलाओं के निर्णयों को भी मान्यता मिलेगी? क्या कुछ महिलाओं के विकास और सशक्तीकरण को संपूर्ण महिलाओं का सशक्तीकरण मान लिया जाए? और अंत में क्या अंतरराष्टï्रीय महिला दिवस महिलाओं की दशा सुधारने में सार्थक भूमिका निभा पाने में सफल हुआ है?
भारत में महिला सशक्तीकरण की बात हमेशा से होती रही है। भारतीय संविधान में लिंग के आधार पर किसी प्रकार के भेदभाव को वर्जित किया गया है लेकिन आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी समाज में महिलाओं की स्थिति में कोई खास अंतर नहीं आया है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्थितियां इसका उदाहरण है। यहां आज भी बेटे और बेटियों में भेदभाव होता है। अभिभावक लड़कियों की पढ़ाई को लेकर गंभीर नहीं दिखते हैं। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की उच्च शिक्षा का प्रतिशत बेहद कम है। नौकरियों में भी योग्यता के बावजूद महिलाओं को अपने पुरुष सहयोगी से कम वेतन मिलता है। भ्रूण हत्या और दहेज की परंपरा बरकरार है। महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ते जा रहे हैं। यह दीगर है कि कुछ महिलाओं ने अपने बूते बुलंदियों को छुआ और सफल रही हैं। लेकिन ऐसी सफल महिलाओं को भारत की आधी आबादी के परिप्रेक्ष्य में देखे तो हकीकत का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि महिलाओं के सशक्तीकरण का झुनझुना बजाना यहां के राजनीतिक दलों और सरकारों का प्रिय शगल रहा है। महिला सशक्तीकरण के लिए सरकारों ने कई योजनाएं चलाई। लेकिन ये योजनाएं महज जागरूकता अभियान बनकर रह गई है। संसद में आज तक राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए पेश किया गया महिला आरक्षण बिल पारित नहीं हो सका। जाहिर है केवल सरकार के भरोसे और साल में एक बार अंतरराष्टï्रीय महिला दिवस मना लेने से कोई अंतर नहीं आने वाला है। महिलाओं को अपने हक के लिए सतत लड़ाई लडऩी होगी वरना समाज की सामंती सोच उन्हें आगे नहीं बढऩे देगी।

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