त्रिपुरा में हिंसा और सियासत

सवाल यह है कि राज्य में हिंसा की असली वजह क्या हैं? क्या इस अराजकता के पीछे गहरी साजिश है? क्या इसे बदले की भावना से की गई कार्रवाई के तौर पर देखा जा सकता है? क्या हिंसा राज्य को विकास के रास्ते से भटकाने और नई सरकार को बदनाम करने के लिए की गई है?

चुनाव नतीजों के बाद त्रिपुरा हिंसा की चपेट में आ गया है। कई जिलों से तोडफ़ोड़ और आगजनी की गई। रूसी क्रांति के नायक व्लादिमिर लेनिन की मूर्ति तक को ढहा दिया गया। सीपीएम ने राज्य में हिंसा के लिए भाजपा और आईपीएफटी के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार बताया है। तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है जबकि कई थाना क्षेत्रों में धारा 144 लगा दी गई है। वहीं भाजपा ने हिंसा के लिए वामदल के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार बताया है। सवाल यह है कि राज्य में हिंसा की असली वजह क्या हैं? क्या इस अराजकता के पीछे गहरी साजिश है? क्या इसे बदले की भावना से की गई कार्रवाई के तौर पर देखा जा सकता है? क्या हिंसा राज्य को विकास के रास्ते से भटकाने और नई सरकार को बदनाम करने के लिए की गई है? क्या सियासत के लिए हिंसा को जायज ठहराया जा सकता है? क्या यह हिंसा सत्ता से बेदखल होने की निराशा का परिणाम भर है?
सत्ता परिवर्तन के साथ त्रिपुरा में हिंसक घटनाओं का घटित होना गंभीर चिंता का विषय है। यहां वर्षों से सत्ता में रहा वामदल आज विपक्ष की भूमिका में है। भाजपा यहां सरकार बनाने जा रही है। हैरत यह है कि इसके पहले यहां चुनावी नतीजों के बाद हिंसा शायद ही कभी हुई हो। हालांकि माणिक सरकार पर विरोधी विचारधारा के कार्यकर्ताओं के उत्पीडऩ के आरोप लगते रहे हैं। चुनाव के दौरान भाजपा ने वाम सरकार पर भय की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए निशाना साधा था। राज्य में अचानक हिंसा क्यों भडक़ उठी यह जांच का विषय है। बावजूद इस हिंसा पर भाजपा और सीपीएम को एक दूसरे पर ठीकरा फोडऩे की जगह इसकी तह तक जाना चाहिए। सियासत में हिंसा को जगह नहीं दी जा सकती है न ही इसे विरोधियों को बदनाम करने का साधन बनाना चाहिए। ऐसा करने वाली पार्टी की साख पर बट्टा लगता है। दूसरे लोकतंत्र में जीत और हार होती रहती है। मूल्यों और विचारधारा की लड़ाई में हिंसा को स्थान देने वाले दल एक दिन हाशिए पर चले जाते हैं। इस मामले पर सत्तारूढ़ भाजपा को गंभीरता से सोचना होगा वरना जिस शांति व्यवस्था और विकास का वादा कर वह सत्ता में आई है, पूरा नहीं कर पाएगी। साथ ही इसे जनादेश की अवमानना भी माना जाएगा। वहीं दूसरी ओर वामदलों को सही रूप में विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता है। लिहाजा आरोप की राजनीति को छोडक़र दोनों दलों को राज्य के विकास को तवज्जो देना चाहिए।

Pin It