कांग्रेस मुक्त भारत से पहले देश वामपंथ मुक्त होने की राह पर

आशीष वशिष्ठ

पूर्वोत्तर भारत के तीन राज्यों- त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के विधानसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए ‘गुड न्यूज’ लेकर आए हैं। त्रिपुरा में तो भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में है। वहीं मेघालय व नागालैंड में उसने दमदार प्रदर्शन से विरोधियों की नींद उड़ाने का काम किया है। भले ही तीनों राज्यों की गिनती राजनीतिक और सीटों की हिसाब से छोटे राज्यों में की जाती हो। लेकिन कुल 180 विधानसभा सीटों और 5 लोकसभा सीटों वाले इन तीन राज्यों में भाजपा की बढ़त कई मायनों में अहम है। गुजरात में कांटे की टक्कर के बाद मिली जीत, राजस्थान और मध्य प्रदेश के उपचुनाव में मिली हार के बाद पूर्वोत्तर से जीत की हवा निश्चित तौर पर उत्साह बढ़ाने का काम करेगी। खासकर त्रिपुरा जहां भाजपा ने पच्चीस साल पुराना कम्युनिस्टों का किला ढहाने का नामुमकिन कारनामा किया है। असम के साथ-साथ मणिपुर और अरुणाचल में भाजपा की सरकार है, तो सिक्किम में पवन चामलिंग एनडीए का हिस्सा हैं।
त्रिपुरा में चुनाव प्रचार और वोटिंग के बाद ऐसी खबरें आ रही थीं कि पूर्वोत्तर में बदलाव की बयार बह रही है। त्रिपुरा में पहली मर्तबा भाजपा न केवल मुकाबले में खड़ी दिखाई दे रही थी बल्कि वामपंथियों के तीन दशक के एकाधिकार को तोडक़र सत्ता बनाने की हैसियत में दिख रही थी। 60 विधानसभा सीटों वाले उत्तर पूर्व के इस छोटे से राज्य में अब तक मुख्य विपक्षी दल रहने वाली कांग्रेस का खाता न खुलना कांग्रेस और विशेषकर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए चिंता की बात है। त्रिपुरा के युवा वर्ग में वामपंथी सरकार के प्रति काफी रोष व्याप्त था जिसका फायदा भाजपा को मिला। भाजपा ने एक स्थानीय जनजातीय संगठन आईपीएफटी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। त्रिपुरा पर भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस की नजरें पिछले काफी समय से थीं और पार्टी धीरे-धीरे अपनी तैयारियों में जुटी थी। आंकड़ों पर नजर डालें तो त्रिपुरा में 2013 के चुनाव में बीजेपी ने 50 उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिनमें से 49 की जमानत जब्त हो गई थी। 2008 में भी पार्टी के 49 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी। 1998 में पार्टी ने पहली बार राज्य की सारी 60 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन 58 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। वर्ष 2013 में विधानसभा के चुनावों में माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की 49 सीटें आयीं थीं जबकि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई को एक सीट मिली थी और दस सीटों से साथ त्रिपुरा में कांग्रेस पार्टी मुख्य विपक्षी दल थी। पांच साल पहले त्रिपुरा में बीजेपी अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी और वहां के सियासी माहौल में उसे गंभीरता से भी नहीं लिया जाता था, उसने सभी राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाते हुए त्रिपुरा में बेहतरीन प्रदर्शन किया है और सरकार बनाने जा रही है। त्रिपुरा के नतीजों ने कांग्रेस की चिंता बढ़ाने का काम किया है। ऐसा आभास हो रहा है कि कांग्रेस के लिये यहां चिंतन-मंथन की संभावना भी खत्म हो गयी है। नागालैंड के चुनाव नतीजे भी भाजपा के पक्ष में रहे। यहां वह गठबंधन की सरकार बनाने जा रही है। मेघालय में भी भाजपा पहली मर्तबा लड़ाई में न सिर्फ दिखाई दे रही थी बल्कि वह सरकार बनाने के इरादे से मैदान में उतरी थी। भले ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सहित वहां के चर्च पदाधिकारी भाजपा को हिन्दू पार्टी बताकर ईसाई मतदाताओं को भयभीत कर रहे थे किन्तु छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों से समय रहते गठबंधन की वजह से कुछ बरस पहले तक इन पूर्वोत्तर राज्यों में अपरिचित बनी रही भाजपा का मैदान में मुस्तैदी से डटे रहना और राष्ट्रीय राजनीति के प्रतिनिधि के तौर पर अब तक उपस्थित कांग्रेस का विकल्प बनते जाना मायने रखता है। मेघालय में साल 2013 में हुए पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 29 सीटों के साथ जीत दर्ज की थी। कांग्रेस के अलावा सीटों के आधार पर दूसरे नंबर पर निर्दलीय उम्मीदवार रहे। निर्दलियों ने 13 सीटों पर कब्जा जमाया था। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (मेघालय) को कुल 8 और हिल स्टेट पिपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को सिर्फ 4 सीटों से संतोष करना पड़ा था। एनसीपी ने भी 2 सीटों के साथ राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी, जबकि भाजपा यहां खाता भी नहीं खोल पायी थी। हालांकि इस चुनाव में मेघालय में कांग्रेस 22 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी लेकिन वहां के सभी दलों ने गैर कांग्रेसी सरकार बनाने का निर्णय लिया है। इस गठबंधन में भाजपा शामिल हो गई है। कांग्रेस जिस तरह पूर्वोत्तर के इन छोटे-छोटे राज्यों में हाशिये पर सिमटती जा रही है वह उसके लिए अच्छा नहीं है। पहले यहां कांग्रेस की स्थिति मजबूत हुआ करती थी। धीरे-धीरे वहां आदिवासियों की क्षेत्रीय पार्टियां पनपी जिन्हें ईसाई मिशनरियों ने संरक्षण और समर्थन देकर धर्मांतरण का एजेंडा लागू किया। मिशनरियों की शह पर अलगाववादी ताकतें प्रभावशाली होती गईं। यहां भारत विरोधी भावनाएं यदि मजबूत हुईं तो उसके पीछे मिशनरियों और उनके साथ वामपंथी गुटों की संगामित्ति की बड़ी भूमिका रही है। त्रिपुरा में भाजपा की सरकार वामपंथियों से अधिक कांग्रेस के लिए बुरी खबर हैं क्योंकि साम्यवादी आंदोलन की जड़े तो सूखने की कगार पर हैं ही किन्तु उसके स्थान पर भाजपा का उभार कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को वास्तविकता में बदलने की वजह बनता जाएगा।

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