एक्टिव पॉलिसी अपनाना जरूरी

सुशांत सरीन

खबरें आयी हैं कि पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना पर हमला करने के लिए आतंकवादी संगठनों को स्नाइपर शूटरों को सौंप दिया है। इस खबर के हवाले से कुछ चीजों को समझना बहुत अहम है। नियंत्रण रेखा पर जब भी इस तरह की घटनाएं होती हैं, उसमें ऐसे शूटरों का इस्तेमाल तो होता ही है। सीमा पर तनाव तो हमेशा रहता ही है, और अक्सर फायरिंग होती रहती है, जिसे ब्लाइंड फायरिंग कहते हैं। लेकिन, स्नाइपर शूटरों वाली फायरिंग आम तरीके की फायरिंग नहीं होती, बल्कि एक लक्षित फायरिंग होती है, और यह सीधे सैनिकों को मारने की कोशिश से लैस होती है।
स्नाइपर शूटिंग के लिए इस्तेमाल की जानेवाली राइफल से बटन के सूराख को भी निशाना बनाया जा सकता है। इसलिए हमारी रक्षात्मक प्रणाली भी इसके लिए अलग होनी चाहिए। यह कोई पहली बार नहीं है कि पाकिस्तान ने ऐसा किया हो, यह तो हमेशा ही वह करता रहता है। भारत में रक्षा क्षेत्र में सामरिक आधुनिकता की कोशिश ठप्प पड़ी हुई हैं। पाकिस्तान के पास ऐसी राइफलें अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रिया की बनी हुई हैं और अतिआधुनिक हैं। इनकी मारक दूरी कुछ ज्यादा है। हालांकि, भारतीय सेना के पास भी स्नाइपर शूटर हैं और रूस की बनी ऐसी राइफलें हैं, लेकिन वे बहुत पुरानी हैं और उनकी मारक दूरी भी कम है, करीब 500 से 800 मीटर। दुनियाभर में हथियारों को लेकर बहुत आधुनिकता आयी है, लेकिन हम अब भी इसके कई मामलों में पीछे हैं। मौजूदा वक्त में युद्ध में जीत उसी की होनी संभव है, जो ज्यादा दूर तक मार कर सकता है। इसलिए सबसे पहली जरूरत तो इस बात की है कि सैन्य हथियारों को अतिआधुनिक बनाने की कोशिश हो। तभी मुमकिन है कि हम सीमा पर अपनी न सिर्फ स्थिति मजबूत रख पायेंगे, बल्कि दुश्मनों का मुंहतोड़ जवाब भी दे पायेंगे। दुश्मन को यह बात पता होती है कि सामने वाले की सामरिक क्षमता क्या है, इसलिए हमारी तैयारी उससे ज्यादा मजबूत होनी चाहिए। भारत सरकार ने ऐसे आधुनिक हथियारों के लिए क्लियरेंस तो दिया है, लेकिन इतना जल्दी संभव नहीं है कि सैन्य हथियार आधुनिक हो जायें। क्योंकि मसला यह है कि कोई सरकार अपनी सामरिक शक्ति को बढ़ाने और आधुनिक बनाने के लिए किस तरीके से काम करती है और जिस तरीके से सरकारें काम करती हैं, उससे तो लंबी दूरी तक मार करनेवाली राइफलों के क्लियरेंस मिलने और फिर उसकी खरीद में दशकों तक का समय लग सकता है। इसमें भी अगर सरकार बदल गयी और कोई नया रक्षा मंत्री आयेगा, तो वह अपने तरीके से काम करने लगेगा, जिसका असर पुराने सौदों पर पडऩा ही है, क्योंकि वह अब नये सिरे से चीजों को देखना शुरू करेगा।
कुल मिलाकर तथ्य यही निकलता है कि या तो हम इसी तरह से खेलते रहें और अपनी सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाते रहें या फिर हर जरूरी हथियार की जल्द से जल्द खरीद को संभव बनाकर सेना के आत्मविश्वास और ताकत को बढ़ायें। क्योंकि, अगर नयी राइफलें आयेंगी, तो इन्हें चलाने के लिए सैनिकों को ट्रेंड भी करना पड़ेगा, जिसमें कुछ वक्त तो लगेगा ही। लेकिन, जिस देश में रक्षा मंत्रालय का इन बातों की कोई चिंता ही नहीं है और दूसरी बात कि तीन-चार साल में सरकार कई रक्षा मंत्री तक बदल चुकी है और अक्सर रक्षा मंत्री वही होता है जो वित्त मंत्रालय भी संभालता हो, तो उससे इस जल्दी की उम्मीद करना बेमानी है। इससे दोनों मंत्रालय प्रभावित होंगे ही। इस तरह से रक्षा मंत्रालय का काम नहीं चलता, उसे एक पूर्ण मंत्री चाहिए ही। यह एक बड़ा मसला है। हमारी मौजूदा सरकार के लिए और फिलहाल इसका कोई हल भी नजर नहीं आ रहा है।
जहां तक पाकिस्तानी सेना द्वारा आतंकी संगठनों को स्नाइपर शूटर सौंपने की बात है, तो हमें यह गांठ बांध लेनी चाहिए कि पाकिस्तान में सारे दहशतगर्द उसकी पैरामिलिट्री है। वे दहशतगर्द नहीं हैं, बल्कि पाक सेना का हिस्सा हैं और उसी के साथ काम करनेवाले लोग हैं। दहशतगर्दों को पाक सेना से अलग करके देखना हमारी कमअक्ली है। देश की सुरक्षा को लेकर सरकारें भले ही बहुत शोर करें कि वे ये करेंगी, वे करेंगी, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकारों ने नये हथियारों खरीदने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखायी है। हमने ज्यादातर जहाज ही खरीदे हैं, जो कि अच्छी बात है, लेकिन सैनिकों के लिए रोजमर्रा की जरूरत की बहुत सी चीजों की जरूरत पड़ती है, जिसमें आधुनिक तकनीक से लैस हथियारों के साथ ही रात में दूर तक मार करने के लिए नाइटविजन हथियार भी आते हैं। आधुनिक तकनीक से लैस एक सैनिक खुद को अपने दुश्मन से बहुत ज्यादा ताकतवर महसूस करता है, और यही उसका आत्मविश्वास भी बढ़ाता है, जो उसे जीत की ओर ले जाता है। लेकिन, विडंबना है कि सरकारों का इस ओर कोई खास ध्यान नहीं है। नतीजा, हमारे सैनिक आये दिन शहीद हो रहे हैं। आज यह हालत है, ऐसे में अगर कल की तारीख में जंग हो जाती है, तो हमारी क्या तैयारी है, यह सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए। हर साल बजट में मंत्री यह बोलकर अपनी जवाबदेही पूरी कर लेता है कि हमने रक्षा के क्षेत्र में इतने पैसे दे दिये हैं और अगर जरूरत पड़ी, तो और भी देंगे। पिछले कई सालों की बजट लिस्ट देखिये, सब में यही बयान मिलेंगे। इसका अर्थ यही है कि हम कुछ दे नहीं रहे हैं, जरूरत पड़ी तो देंगे, और जब जरूरत पड़ती है, तब मंत्रालय के पास न तो वक्त होता है और न ही सामरिक सौदों को वाजिब दाम में पटाने की कूवत। नतीजा, सौ रुपये की चीज हजारों रुपये में खरीदी जाती है। कई सप्ताह या यूं कह लें कि कई महीनों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि पाकिस्तान स्नाइपर फायरिंग कर रहा है और हमारे सैनिक शहीद हो रहे हैं। मसला यह है कि जब पाकिस्तानी सेना कुछ करती है, तभी हम उसका तोड़ तलाशने की कोशिश करते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि हम कुछ करें और पाकिस्तान की सेना उसका तोड़ निकालती रह जाये। इस मामले में हमारी सारी पॉलिसी रिएक्टिव है, एक्टिव नहीं है। यानी पाकिस्तान के एक्शन पर ही हम रिएक्शन कर पा रहे हैं। इस पॉलिसी को बदलकर हमें एक्टिव पॉलिसी अपनानी होगी, तभी मुमकिन है कि हम अपने सैनिकों की शहादत रोक सकेंगे और सीमा पर शांति स्थापित करेंगे।

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