कर्ज ले लो

अपने यहां होनहारों की कमी नहीं जी। विश्वास नहीं हो रहा हो तो बैंक वालों से पूछ लो। बैंक वाले बेचारे मारे-मारे फिर रहे हैं। भाई अब रो क्यों रहे हों। पहले तो हाथ खोलकर कर्ज बांटा। रूतबा बढ़ा रहे थे। पूंजीपतियों को नोट बांट रहे हैं जी। गदगद थे। ले लो जी कर्ज। करोड़ क्या हजारों करोड़ ले लो। बैंक तुम्हारा ही है। जनता का पैसा है। कोई ले जाए। बस रकम चुका देना। सामने वाले ने भी जनता का पैसा अपना समझ लिया और यह ले वह ले। अब बैंक वाले चिल्ला रहे हैं। भाग गया रे। करोड़ों लेकर भाग गया रे। कर लो क्या करते हो। अरे भाई अपने भ्रष्टïाचारी भाइयों को सुधारो वरना जिदंगी में रोना ही हिस्से में आएगा।

अपने मंत्री जी बुरे फंस गए। भरी सभा में गलत ज्ञान बांट गए। लोगों से कह दिया कि एक ही इंजेक्शन का प्रयोग कई लोगों पर करने से कोई संक्रमण नहीं फैलता है। मंत्री जी के यह कहते ही चिकित्सकों की जमात का मुंह उतर गया। बेचारे एक दूसरे का मुंह देखने लगे। मंत्री जी के बयान ने उनके चिकित्सकीय ज्ञान की धज्जियां उड़ा दीं। डॉक्टरों की जमात को न उगलते बन रहा था न निगलते। अब क्या करें। खुद मंत्री जी को भाषण देने के लिए बुलाया था। फीता कटवाकर उद्घाटन करवाया। बेचारे मंत्री जी के ज्ञान की बलिहारी देने के अलावा कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं थे। बाद में पता चला कि एक झोलाछाप डॉक्टर ने एक ही इंजेक्शन का प्रयोग लोगों पर किया था, जिससे कई लोग एचआईवी से संक्रमित हो गये थे। मामला सुर्खियों में था। ऐसे में मंत्री जी का यह बयान डॉक्टर साहब को पचा नहीं। किसी ने धीरे से मंत्री जी को माजरा समझाया तो बेचारे मंत्री जी मुंह उतर गया। वे बगलें झांकने लगे।

वीआईपी इलाके में सुरक्षा की कमान संभाल रहे बड़े साहब से उनके मातहत ही नहीं फरियादी भी परेशान हैं। मजाल कोई उनको नजरअंदाज करके निकल जाएं। साहब अपनी मुस्तैदी से कम अपने बड़बोलेपन से ज्यादा चर्चित हो गए हैं। गलती से अगर कोई उनके पास फरियाद लेकर पहुंच गया तो फिर उसका भगवान ही मालिक है। फरियाद तो साहब इस कान से सुनते हैं और दूसरे से निकाल देते हैं लेकिन अपनी ऊंची पहुंच की जानकारी सामने वाले को देने से चूकते नहीं है। इसी रौ में वे बाबा से अपनी घनिष्ठïता का डंका भी पीट लेते हैं। साहब की इस आदत से अब मातहत की ऊब गए हैं और उनको देखने ही कन्नी काट रहे हैं। साहब के बड़बोलेपन की कहानी अब दूर तलक पहुंच चुकी है।
लोकसभा उपचुनाव का बिगुल बज चुका है। सो पंजा, साइकिल और कमल दल वाले लंगोट बांधकर मैदान में कूद पड़े हैं। कूदे क्यों न साख का सवाल है। कमल दल वाले अपनी कुर्सी को बचाने में जुटा है साइकिल और पंजे वाले कुर्सी को झटकने की ताक में हैं। सभी साम-दाम दंड भेद की नीति अपना रहे हैं। एक दूसरे को तौल रहे हैं। मामला हाथ से न निकल जाए लिहाजा साइकिल और कमल दल वालों ने बराबरी के पहलवान मैदान में उतार दिए हैं। देखना यह है कि ये पहलवान क्या गुल खिलाते हैं। जब तक परिणाम नहीं आते धुकधुकी लगी हुई है। लेकिन पहलवानों की हौसला आफजाई खूब की जा रही है। बाकी आगे-आगे देखिए होता है क्या।

फाइलों के खेल में उलझे दिव्य पुडिय़ा वाले साहब

शहर को चमकाने वाले विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे दिव्य पुडिय़ा वाले साहब के कारनामों की गिनती नहीं जी। जरा सा आंख फिरी नहीं साहब हाथ की सफाई दिखा देते हैं। आंखों से सूरमा चुरा लेते हैं और सामने वाले को पता भी नहीं चलता है। मोटी मलाई काटने में उनका कोई शानी नहीं है। उनकी इस प्रतिभा के कायल उनके चेले भी है। कई साहब तो उनकी इस प्रतिभा से ईष्या भी करते हैं। वे बड़ी सफाई से फर्जी फाइलों का खेल खेल लेते हैं। मोटी मलाई दिख जाए तो फिर भुगतान भी लगे हाथ करवा देते हैं लेकिन कुछ दिलजले साहब की दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की से जलभुन गए हैं। फर्जी तरीके से भुगतान के एक मामले में जांच की आंच साहब तक पहुंच चुकी है। सो साहब परेशान हैं। मामले को रफा-दफा करने में जुटे हैं।

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