भारत प्रयास कर ईरान को दक्षेस में लाये, बड़ा फायदा होगा

ईरान और इस्राइल के संबंध कटुतम हैं लेकिन भारत ने दोनों को साध रखा है। रुहानी ने हैदराबाद की सुन्नी मक्का मस्जिद में जाकर भारत के शिया और सुन्नी मुसलमानों को पारस्परिक सद्भाव का संदेश तो दिया ही, सीरिया, इराक और अफगानिस्तान का जिक्र करके इस्लाम के नाम पर दहशतगर्दी करने का भी कड़ा विरोध किया। उनकी इस यात्रा के दौरान भारत-ईरान सामरिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों को उच्चतर स्तर पर ले जाने वाले नौ समझौतों पर दस्तखत भी हुए।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी की यह भारत-यात्रा दोनों देशों के संबंधों को प्रगाड़ बनाने में विशेष योगदान देगी। रुहानी को पता है कि डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के बीच दांत कटी रोटी है लेकिन इसके बावजूद रुहानी ने नई दिल्ली में भारत के प्रति अप्रतिम प्रेम का प्रदर्शन किया। उन्होंने न सिर्फ आतंकवाद का हर तरह से मुकाबला करने में भारत को साथ देने का वादा किया बल्कि अमेरिका को ऐसी झिडक़ी लगाई है, जो आज तक किसी भी विदेशी नेता ने नहीं लगाई!
रुहानी ने अमेरिका से पूछा कि आप पांच महाशक्तियां सुरक्षा परिषद में बैठी हैं लेकिन आप भारत को छठी महाशक्ति क्यों नहीं मानते। आपके पास परमाणु बम है तो भारत के पास भी है और उसके पास सवा अरब लोग भी हैं। रुहानी ने अमेरिका से पूछा है कि वह भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य क्यों नहीं बनवाता। ईरान और इस्राइल के संबंध कटुतम हैं लेकिन भारत ने दोनों को साध रखा है। रुहानी ने हैदराबाद की सुन्नी मक्का मस्जिद में जाकर भारत के शिया और सुन्नी मुसलमानों को पारस्परिक सद्भाव का संदेश तो दिया ही, सीरिया, इराक और अफगानिस्तान का जिक्र करके इस्लाम के नाम पर दहशतगर्दी करने का भी कड़ा विरोध किया। उनकी इस यात्रा के दौरान भारत-ईरान सामरिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों को उच्चतर स्तर पर ले जाने वाले नौ समझौतों पर दस्तखत भी हुए। चाबहार के शाहिद बहिश्ती बंदरगाह के संचालन का ठेका अब भारत को डेढ़ साल के लिए मिल गया है। यह बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से सिर्फ 80 किमी दूर है। अब भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया के पांचों राष्ट्रों तक पहुंचने के लिए पाकिस्तान की जरूरत नहीं रहेगी। मुंबई से हमारे जहाज अब सीधे चाबहार पहुंचेंगे। ईरान और अफगानिस्तान के बीच भारत अब रेल भी बनाएगा। कोई आश्चर्य नहीं कि मध्य एशिया से तेल और गैस की पाइपलाइनें भी समुद्री मार्ग से सीधे भारत आ जाएं। ईरान के साथ स्वास्थ्य, चिकित्सा, दवाइयों, खेती, विनिवेश आदि के समझौते तो हुए हैं, प्रत्यर्पण संधि और राजनयिकों की वीजा-मुक्ति पर भी समुचित प्रावधान हुए हैं। ईरान में भारत-विद्या और भारत में फारसी के पठन-पाठन पर भी विचार किया गया है। मेरी राय तो यह है कि ईरान को दक्षेस (सार्क) का भी सदस्य बनाया जाना चाहिए। यदि हम संपूर्ण दक्षिण एशिया (याने प्राचीन आर्यावर्त) में एक महासंघ खड़ा करना चाहते हैं तो ईरान उसके सबसे सशक्त स्तंभों में से एक होगा।

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