बदल चुका है युद्ध का तरीका

आकार पटेल

डेढ़ दशक पहले आखिरी बार दो देशों के बीच कोई बड़ा युद्ध लड़ा गया था। वर्ष 2003 में हुए इस एकतरफा युद्ध में जॉर्ज बुश ने सद्दाम हुसैन को परास्त किया था (मैं यहां शुरुआती हमले की बात कर रहा हूं, न कि कब्जा करने की)। इराकियों को कई वर्षों से आधुनिक हथियार नहीं मिल पाये थे तथा उनके पुराने टैंक और लड़ाकू जेट अमेरिकी ताकत के सामने ठहर नहीं सकते थे। देशों द्वारा सैन्य हथियारों की खरीद के लिए बहुत ज्यादा रकम खर्च की जाती है।
उदाहरण के लिए, इस वर्ष भारत के रक्षा बजट में अकेले ऐसे साजो-सामान के लिए एक लाख करोड़ रुपये रखे गये हैं। सैन्य रणनीति के अधिकतर विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि ये उपकरण गणतंत्र दिवस परेड के अलावा कभी भी इस्तेमाल नहीं किये जायेंगे। दो बड़े देशों के बीच भविष्य में जो युद्ध होंगे, वे 2003 में हुए इराक युद्ध से उसी तरह भिन्न होंगे, जैसे इराक युद्ध 1757 में हुए प्लासी के युद्ध से भिन्न था। इसे समझने के लिए हमें खुद से यह पूछना चाहिए कि वास्तव में युद्ध क्या है? दो देशों के बीच तभी युद्ध होता है, जब एक देश इसे लेकर आश्वस्त होता है कि वह अपने सैन्य बल के दम पर दूसरे देश को अपनी मर्जी का करने के लिए मजबूर कर सकता है।
हालांकि, दूसरा देश से बिना हिंसा के भी मन-मुताबिक काम करा पाना संभव है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने कहा है कि 2016 के अमेरिकी राष्टï्रपति चुनाव में रूस ने हस्तक्षेप किया था। रूसी राष्ट्रपति पुतिन इस चुनाव में हिलेरी क्लिंटन की हार और डोनाल्ड ट्रंप की जीत चाहते थे। यह भी आरोप है कि इसमें संभवत: ट्रंप ने रूस का साथ दिया था। इस मामले की अभी भी जांच चल रही है, लेकिन पुतिन और उनके जासूसों ने अमेरिकी चुनाव में दखलअंदाजी की थी और संभवत: उसे निर्णायक रूप से प्रभावित किया था, इस बात में कोई शक नहीं है।
ट्रंप के न्याय विभाग ने 16 फरवरी को 13 रूसी नागरिकों, जिनमें से ज्यादातर रूस के सेंट पीटर्सबर्ग स्थित एक समूह- इंटरनेट रिसर्च एजेंसी- के हैं, पर अभियोग लगाया है। इन लोगों पर आरोप है कि इन्होंने एक निजी नेटवर्क पर कई सारे सोशल मीडिया एकाउंट बनाये, जिन्हें देखने पर ऐसा लगता था कि ये एकाउंट अमेरिका से संचालित किये जा रहे हैं, जबकि सच्चाई यह थी कि उनका संचालन रूस से हो रहा था। अमेरिकियों का मानना है कि ये एकाउंट, जिस पर पुतिन ने दो करोड़ रुपये से भी कम खर्च किये, ने ट्रंप को जिताने में मदद की। रूसी उस चुनाव में ट्रंप की जीत इसलिए चाहते थे, क्योंकि उन्हें डर था कि हिलेरी विश्व में रूस के प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिबंधों और दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करेंगी। इस प्रकार अमेरिका से बिना कोई युद्ध किये पुतिन ने वह पा लिया जो वे चाहते थे।
पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि संघ तीन दिनों में सेना तैयार कर उसे सीमा पर भेज सकता है, जबकि भारतीय सेना को ऐसा करने में छह महीने का समय लगता है। सेना के विरुद्ध बयान मानकर इस बात की खूब आलोचना हुई थी, पर मैं इस पहलू पर चर्चा नहीं कर रहा हूं। मेरी चिंता यह है कि मोहन भागवत अपनी सेना के बारे में क्या सोचते हैं। क्या वे 1962 के युद्ध की फिल्मों से प्रभावित होकर सोचते हैं कि चीनी सैनिक हाथों में बंदूकें लिए पहाड़ों से उतरेंगे? और अगर ऐसा हुआ तो संघ के अनुयायी भारतमाता की रक्षा के लिए क्या करेंगे? संघ की शाखा में नियमित तौर पर स्वयंसेवकों को कुछ शारीरिक गतिविधियों का अभ्यास कराया जाता है और वे देशभक्ति गीत गाते हैं। ऐसा प्रशिक्षण आज के युद्ध को तो छोड़ दें, सौ साल पहले के युद्ध के लिए भी पर्याप्त नहीं है। आज गाइडेड मिसाइलों के युग में तो यह बिल्कुल ही बेमानी है।
किसी आधुनिक देश के खिलाफ युद्ध में भारत को योद्धाओं या हथियारों की कमी की वजह से ज्यादा नुकसान नहीं होगा। भारतीय सेना विश्व की सबसे बड़ी सेनाओं में एक है। नुकसान की आशंका तकनीक की कमी की वजह से है और यह घातक है। इंटरनेट सेवा का ठप्प पड़ जाना आज किसी देश को पंगु बनाने के लिए काफी है। बैंकिंग प्रणाली ध्वस्त हो जायेगी और घंटों तक उस देश के सारे काम रुक जायेंगे। आंतरिक संपर्क इतना अस्त-व्यस्त हो जायेगा कि अराजकता पैदा हो जायेगी। सैन्य कार्रवाई के रूप में भी संचार को अक्षम करना किसी देश को तबाह करने के लिए काफी होगा। उदाहरण के लिए, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम पर निर्भरता, जो अमेरिका द्वारा नियंत्रित है, हवाई जहाजों और मिसाइलों को बेअसर बना सकती है। ऐसे में अगर लाखों लोग भी देश पर बलिदान होने को तैयार हो जाएं, तब भी कोई खास मदद नहीं मिलेगी। यही आज के युद्ध का नया तरीका है और अगर इसे अब तक नहीं समझा गया है, तो यह जानकारी के अभाव के कारण नहीं है, बल्कि अज्ञानता की वजह से है। मैंने सोचा कि इस बारे में लिखना चाहिए क्योंकि हमें इस बात को लेकर जागरूक होना चाहिए कि संघ और हमारे प्रधानमंत्री समेत इसके स्वयंसेवकों के सोच की गुणवत्ता इस तरह की है। वह बेहद पुरानी और साधारण है. यह देशभक्ति की आग हो सकती है और इस इरादे पर संदेह भी नहीं है। पर सोच की यह गुणवत्ता चिंताजनक है और इससे मैं भयभीत हूं।

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