भारत को आतंकवादियों की चुनौती

यहां सवाल उठता है कि आखिर कब तक भारत ऐसे हमले बर्दाश्त करता रहेगा। सेना और सरकार की तरफ से लगातार घाटी में आतंकियों के खात्मे की बात की जा रही है लेकिन इसके बावजूद भी हमले नहीं रुक रहे हैं। घाटी में लगातार आम नागरिकों और सुरक्षाबलों पर हमला किया जा रहा है।

भारत को आतंकवादी लगातार चुनौती दे रहे हैं। 48 घंटे में तीन सैन्य शिविर पर हमला कर एक बार फिर आतंकवादियों ने सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी है। 10 फरवरी को जम्मू के बाहरी इलाके सुंजवां के सैन्य शिविर पर हमला, 11 फरवरी को शोपियां में और 12 फरवरी की सुबह श्रीनगर के करन नगर में सीआरपीएफ कैंप पर आतंकियों ने हमला कर भारत के लिए चुनौती पेश की है। यहां सवाल उठता है कि आखिर कब तक भारत ऐसे हमले बर्दाश्त करता रहेगा।
सेना और सरकार की तरफ से लगातार घाटी में आतंकियों के खात्मे की बात की जा रही है लेकिन इसके बावजूद भी हमले नहीं रुक रहे हैं। घाटी में लगातार आम नागरिकों और सुरक्षाबलों पर हमला किया जा रहा है। श्रीनगर के करन नगर में सीआरपीएफ कैंप पर आतंकियों के हमले को भले ही नाकाम कर दिया गया हो लेकिन यहां भी एक जवान शहीद हो गया। 10 फरवरी को जम्मू के बाहरी इलाके सुंजवां के सैन्य शिविर पर आतंकवादी हमले में पांच जवान शहीद हो गए थे। इतना ही नहीं आतंकियों की तलाशी के लिए सेना को तीस घंटे से ऊपर मशक्कत करनी पड़ी। करीब पंद्रह महीने पहले उड़ी के सैन्य शिविर पर हुए हमले के बाद इधर कुछ दिनों से आतंकी लगातार सैन्य शिविर को अपना निशाना बना रहे हैं। 31 दिसंबर को पुलवामा में सीआरपीएफ ट्रेनिंग कैंप पर हमले में पांच जवान शहीद हो गए थे जबकि तीन घायल हुए थे। वहीं दस दिन बाद ही लगातार आतंकी सैन्य शिविर पर हमला किए। पिछले साल का हम रिकार्ड देखे तो हर महीने आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर में कहीं न कहीं बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया है। उड़ी हमले के बाद सुंजवां दूसरा बड़ा आतंकी हमला है। उड़ी हमले के बाद भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तानी सीमा के भीतर चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को तबाह कर दिया था और माना जा रहा था कि उससे सीमा पार चल रहे आतंकवादी संगठनों की कमर टूट गई है, मगर उसके बाद भी आतंकी घुसपैठ और सुरक्षा ठिकानों पर हमले का सिलसिला रुका नहीं है। सुंजवां हमले की जिम्मेदारी भी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली है। सैन्य शिविरों और सुरक्षा ठिकानों पर इससे पहले के हमलों में भी इसी संगठन का हाथ था। इन सबूतों के बावजूद पाकिस्तानी हुकूमत न सिर्फ अपने यहां चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों से इनकार करती रही है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी दावा करती फिरती है कि भारत उस पर झूठे आरोप मढ़ता रहता है। फिलहाल वक्त है कि सरकार की ओर से एक बार फिर आतंकियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जाए। घाटी में एक बार फिर नए सिरे से ऑपरेशन ऑलआउट को धार देने की जरूरत है, ताकि आतंकियों में सेना का खौफ बरकरार रहे।

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