राजधानी को चाहिए सौ से अधिक PICU और NICU

केजीएमयू के अलावा किसी अस्पताल में नहीं है पीआईसीयू
अन्य सरकारी अस्पतालों में जितनी एनआईसीयू है वह मरीजों की संख्या के हिसाब से नहीं है काफी

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। राजधानी के सभी सरकारी अस्पतालों की नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) फुल होने के कारण जन्म लेने वाले बीमार नवजातों के माता-पिता को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। डॉक्टर चाह कर भी नवजातों को भर्ती नहीं कर पा रहे है जिसकी वजह से अभिभावक एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकने को मजबूर हैं। आलम यह है कि कई नवजातों को भर्ती न मिल पाने के कारण उनकी मौत भी हो रही है।
प्रदेश की राजधानी के सरकारी अस्पतालों में पीआईसीयू और एनआईसीयू की व्यवस्था न होना यह दर्शाता है कि सरकार बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर सजग नहीं हैं। जब राजधानी का यह हाल है तो अन्य जिलों में क्या हाल होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। फिलहाल राजधानी में मेडिकल कॉलेज छोडक़र किसी अस्पताल में पीआईसीयू नहीं है। कुछ अस्पतालों में एनआईसीयू की व्यवस्था है लेकिन वह काफी नहीं है। सिर्फ केजीएमयू में पीआईसीयू की व्यवस्था है। नवजात के इलाज के लिए 16 बेड पर वेंटिलेटर हैं। ऐसे में गंभीर रूप से बीमार बच्चों के माता-पिता को प्राइवेट अस्पतालों में जाना पड़ता है। प्राइवेट अस्पतालों में किस तरह मरीजों का शोषण होता है वह किसी से छिपा नहीं है।

सिविल अस्पताल में खुलेगा पीआईसीयू
चार साल के लम्बे इंतजार के बाद आखिरकार सिविल अस्पताल में पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट खुलने का रास्ता साफ हो गया है। इस यूनिट के लिए स्वास्थ्य विभाग ने 10 वेंटिलेटर का ऑर्डर जारी कर दिया है। उम्मीद है कि अगले महीने यूनिट शुरू होने पर सिविल अस्पताल इस सुविधा वाला पहला अस्पताल बन जाएगा और गम्भीर रूप से बीमार नवजात के लिए वेंटिलेटर की वेटिंग भी काफी कम हो जाएगी।
मालूम हो कि सिविल अस्पताल में साल 2013 में बाल रोग विंग का उद्घाटन किया गया था। उसी वक्त यहां पीआईसीयू खुलने का ऐलान किया गया था। शासन ने दो साल बाद 2015 में बजट पास किया, लेकिन मशीनों की खरीद अब जाकर पूरी हो सकी है। 12-12 लाख के नौ पीआईसीयू वेंटिलेटर और 14 लाख का एक एनआईसीयू वेंटीलेटर खरीदा गया है। इसके अलावा सेंट्रल ऑक्सीजन सप्लाई के लिए 40 लाख का अलग बजट है। यह रकम वार्ड में पाइप बिछाकर बेड पर ही ऑक्सीजन देने की व्यवस्था शुरू करने में खर्च किया जाना है। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, इस यूनिट में बच्चों की दिल की बीमारियों के इलाज के लिए भी एक मशीन लगाई जाएगी।

लोहिया में बढ़ाया जायेगा 12 बेड
लोहिया अस्पताल में 12 बेड का एनआईसीयू पहले से हैं। अब 12 बेड की एक और यूनिट शुरू होने की कवायद चल रही है। दूसरा यूनिट शुरु होने से एक साथ 24 नवजात बच्चों का इलाज किया जा सकेगा। इससे थोड़ी राहत मिलेगी।

लोकबंधु में 12 बेड का एनआईसीयू शुरू
लोकबंधु अस्पताल में 12 बेड का एनआईसीयू 10 फरवरी से शुरू हो गया है। यूनिट शुरू होने से चंदरनगर, रानी लक्ष्मी बाई और सरोजनीनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के मरीजों को फायदा मिलेगा। हालांकि जिस तादात में मरीज आते हैं उसके हिसाब से यह सुविधा काफी नहीं है।

अस्पतालों में फुल हो चुके हैं एनआईसीयू
राजधानी के लोहिया, डफरिन, झलकारी बाई अस्पताल के एनआईसीयू फुल हो चुके हैं। ऐसे में अन्य बीमार नवजात बच्चों को भर्ती नहीं मिल पा रही है। ऐसा ही हाल केजीएमयू के एनआईसीयू का है, जो पूरी तरह फुल हो चुका है। इन अस्पतालों में आने वाले गंभीर नवजात मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों की शरण में जाना पड़ रहा है।

नवंबर से फरवरी माह में ज्यादा संख्या में होता है बच्चों का जन्म
बाल रोग विशेषज्ञों की मानें तो नवबंर से फरवरी माह में बच्चों का जन्म बड़ी संख्या में होता है। ठंड का मौसम होने के नाते इस मौसम में नवजातों में अधिकांश रूप से निमोनिया और विंटर डायरिया की समस्या हो जाती है। झलकारी बाई अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान ने बताया कि कभी-कभी प्री-मैच्योर बेबी और पीलिया से ग्रसित नवजात जन्म के बाद रोते नहीं हैं। इन्हें सांस लेने में दिक्कत होती है या फिर किसी इंफेक्शन की चपेट में होते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें एनआईसीयू में इलाज की जरूरत होती है, ताकि उसे फोटोथैरेपी, वार्मर और वेंटीलेटर की सुविधा मिल सके।

लगातार बढ़ रही नवजातों की वेटिंग

ड्डकेजीएमयू के एनआईसीयू में रोज पांच से छह बच्चों को भर्ती नहीं मिल रही है।
ड्ड डॉक्टर के अनुसार, मशीने फुल हैं।
ड्ड गंभीर बच्चे भर्ती होने के कारण उन्हें हटाकर नए बच्चों को भर्ती नहीं किया जा सकता है।
ड्ड बच्चों को दूसरे सरकारी अस्पताल रेफर करना मजबूरी है।

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