लो फिर हो आया स्मारकों का स्मरण

ज्ञानेन्द्र शर्मा

जिन स्मारकों पर मायावती की सरकार ने करोड़ों खर्च कर डाले थे और जिसकी आलोचना करने में विपक्षी दलों ने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी, उन्हीं को चमकाने के लिए अब प्रदेश की भाजपा सरकार ने 45 करोड़ रुपए के परिव्यय से काम शुरू कर दिया है। स्मारकों और मूर्तियों की दशा सुधारने का काम पूरी गति से शुरू भी हो गया है। इसके साथ ही सरकार को उस जय प्रकाश इंटरनेशनल सेंटर सम्बंधी कथित शिकायतों और और नदी पार गोमती रिवर फ्रंट की दुर्दशा का भी ध्यान आ गया, जिस पर वर्तमान सरकार ने सत्ता पर काबिज होते ही जांच बिठा दी थी और सारा बजट रोक दिया था। रिवर फ्रंट तो लगभग अनाथ ही हो गया था।
देर में ही सही, इसकी सुध सरकार को आ गई। जांच बिठाए जाने के बाद जो ठेकेदार रिवर फ्रंट को सुन्दर काया देने के काम में लगे थे, वे पीछे हट गए थे। वैसे भी उनके पास कोई चारा नहीं था क्योंकि उनका सारा बजट रोक दिया गया था। जब रिवर फ्रंट की हरियाली मुर्झाने लगी और सुन्दर बगिया उजडऩे लगी तो लखनऊ विकास प्राधिकरण अब आगे आया है और उसने प्रस्ताव किया है कि वह रिवर फ्रंट का मेन्टेनेंस करेगा। यह अच्छा प्रस्ताव है और सरकार को इसे तत्काल मान लेना चाहिए।
मायावती सरकार ने स्मारकों को प्रतिश्ठा का प्रश्न बनाते हुए कितना सरकारी पैसा उन पर खर्च किया, यह विवाद का विषय है। एक मोटा अनुमान यह है कि करीब 6 हजार करोड़ रुपए का व्यय किया गया था। जो काम प्रारम्भ किए गए, उनमें शामिल थे: अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल, मान्यवर कांशीराम मेमोरियल, कांशीराम बहुजन नायक पार्क, सांस्कृतिक स्थल, ईको पार्क, बुद्ध स्थल और शारदा कैनाल फ्रंट डेवलपमेंट स्थल, समतामूलक चौराहा, प्रेरणा स्थल और रमाबाई अंबेडकर मैदान आदि। लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इसे पैसे की बरबादी की संज्ञा दी थी। सत्ता में सपा के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आए तो इसमें 40 हजार करोड़ के घोटाले का आरोप लगाते हुए 15 मई 2012 को कहा था कि इसकी जांच के लिए आयोग बिठाया जाएगा। कुछ कामों की जांच लोकायुक्त को भी दे दी गई। इन जांचों का क्या हुआ, किसी को कुछ पता नहीं। अलबत्ता अब उनका जीर्णोद्धार किए जाने का आदेश दिया गया है। जय प्रकाश सेन्टर की जांच में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई और इसलिए उसी ठेकेदार से काम फिर शुरू करा दिया गया। स्मारकों में लगी मूर्तियां हमेशा चर्चा का विषय रही हैं। जब मायावती मुख्यमंत्री थीं तो चुनाव आयोग ने चुनाव के ठीक पहले हाथियों की मूर्तियों को ढके जाने का आदेश दिया था। हाथी मायावती की बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिन्ह जो है। इस पर मायावती ने चुनाव आयोग को खूब खरी खोटी सुनाई थी। तब चुनाव आयोग को मायावती और तत्कालीन मुख्य सचिव को चेतावनी देनी पड़ी थी। पूरे चुनाव के दौरान हाथी की सभी मूर्तियों को प्रदेश भर में ढक कर रखा गया था।
स्मारकों और मूर्तियों का यह मामला हाईकोर्ट भी गया। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने प्रशासन से 29 जून 2005 को कहा था कि जनता को मूर्तियां नहीं, चलने लायक जगह दें। विधानपरिषद में 14 अगस्त 2005 को नगर विकास मंत्री लालजी टंडन ने बताया था कि लखनऊ शहर में 15 जून 2005 तक 65 मूर्तियां स्थापित की जा चुकी हैं। हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि बागों का यह शहर अब कूड़े के ढेर में तब्दील हो चुका है। कोर्ट ने लौरेटो स्कूल चौराहे पर किए जा रहे निर्माण कार्यों और अम्बेडकर मूर्ति के पीछे अवैध निर्माणों को हटाने का भी निर्देश दिया था। न्यायालय ने कहा था कि सडक़ के किनारे और चौराहों पर तीन फीट से अधिक ऊंची मूर्तियां नहीं लगाई जा सकतीं। पूरे शहर में मूर्तियों और स्मारकों की स्थापना के चलते चौराहे अत्यंत बेडौल हो गए हैं। समतामूलक चौराहे की शक्ल तो इतनी बिगाड़ दी गई कि उसके आरपार देखना मुश्किल हो गया। पांच दिशाओं से चौराहे पर आने वाला ट्रैफिक रोज ही बेकाबू रहता है और दुर्घटनाओं का खतरा निरंतर बना रहता है। यही दशा क्लार्क अवध के पास के चौराहे की है जो पास में ही बनाए गए स्मारक के कारण अत्यंत बेडौल बन बैठा है। सडक़ें और चौराहे आवागमन को सुविधापूर्ण बनाने के लिए होते हैं लेकिन हमारे शहर में ये कतिपय लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने का साधन बन गए हैं।
आम तौर पर यह महसूस किया जाता है कि यदि ट्रैफिक को अगर ठीक से संभालना है तो सारे चौराहों को फिर से डिजाइन किया जाना चाहिए और उनके बीच में इतनी जगह निकाली जानी चाहिए कि ट्रैफिक पुलिस उसका इस्तेमाल यातायात को नियंत्रित करने में कर सके। क्या यह बेहतर हो कि मूर्तियों के लिए एक अलग पार्क कायम कर दिया जाय और चौराहों-चौराहों पर लगी सारी मूर्तियों को उसी में ले जाकर स्थापित कर दिया जाय ताकि चौराहे सुख की सांस ले सकें।

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