न्यूनतम समर्थन मूल्य की जटिल गुत्थी, क्या किसानों को मिलेगा फायदा

मृणाल पांडे

दो दशक पहले भारत में एक महान अक्रांति की शुरुआत हुई जिसे हम नई अर्थव्यवस्था कहते हैं। पांच फीसदी के आंकड़े पर ही ठिठकी विकास दर को रफ्तार देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश और सरकारी लाइसेंस कोटा परमिट राज की जकड़बंदी खत्म करने की घोषणा को बीसवीं सदी की सबसे अहम घटना माना गया। यह तब भी नजरअंदाज किया गया कि दल बदलने में माहिर भ्रष्ट भारतीय नेता और नौकरशाही सरकारी ताकत के मूल और चुनावी चंदे के अक्षय पात्र, लाइसेंस कोटा परमिट राज को त्यागने की तनिक भी उतावली न दिखाएंगे। अब तक सरकारें भले ही बदली हों, राज्यों में किसानी से शिक्षा तक की सारी राजकीय या निजी संस्थाओं में पुराने बिचौलियों की ही धमक कायम है। नई अर्थव्यवस्था का घोषित दर्शन यह था कि सरकारी नियम पारदर्शी होंगे तो भ्रष्टाचार कम होगा, मेहनती को मौका मिलेगा, नए उद्योग खुलेंगे, रोजगार बढ़ेंगे और फर्श से अर्श पर जा पहुंचे सफल नए कार्पोरेट्स उन ग्रामीण गरीबों के हक में अपना सामाजिक उत्तरदायित्व जरूर निभाएंगे जिनके बीच से वे आए हैं। 19वीं सदी में अमेरिका और यूरोप में यही हुआ।
आज निजी क्षेत्र में लक्ष्मी जी की महती कृपा भले ही खदानों की मिल्कियत, खनिज एवं तेल उद्योगों, व्यापार, निर्माण, उड्डयन और दूरसंचार सरीखे क्षेत्रों से हो रही है। वहां पैर जमाना और पसारना अंतत: सरकार की सद्भावना, वंशाधारित उद्योग जगत और उद्योगपतियों की भीतरी लोगों से खानदानी करीबी पर निर्भर है। पुराने हों कि नए, उद्योगपति सरकार से गरीबों की मदद के नाम पर छूटें पाकर भी सस्ते में हथियाये इलाके के खेतिहरों की सही भरपाई अपना कर्तव्य प्राय: नहीं मानते, पर जब चुनाव पास आते हैं तब राजनीतिक दल कठोर सच्चाई से टकराते हैं। गुजरात, राजस्थान के नतीजे उनको कह रहे हैं कि उज्ज्वला या बेटी बचाओ-पढ़ाओ, सरीखी आकर्षक सरकारी योजनाएं ग्रामीण इलाकों में लगभग बांझ साबित हो रही हैं जहां अंतत: खेती या मनरेगा ही अधिकतर परिवारों को काम और रोटी दे रहे हैं।
युवा मर्दों के शहर पलायन, खेती विनाशक पर्यावरण बदलावों, बिजली पानी की कमी और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाओं से दूर खेतिहर ग्रामीण समाज सरकार की कार्पोरेट क्षेत्र की दिलजोई और खेतिहरों की असल समस्याओं की उपेक्षा से बेहद नाराज है। इन सबका 2019 के आम चुनावों पर भी विपरीत असर पड़ सकता है। यह जानकर सरकार ने इस बार बजट में कृषि क्षेत्र की बेहतरी के लिए कुछ बड़ी घोषणाएं की हैं। इनमें 23 फसलों की न्यूनतम खरीद कुल लागत के ऊपर 50 फीसदी तक बढ़ाने के प्रस्ताव को एक अभूतपूर्व मुहिम बताना प्रमुख है।
बजट की बारीकियों को पढऩे में सक्षम विशेषज्ञों, जानकारों का कहना है कि कृषि दाम निर्धारक सरकारी संस्था सीएसीपी की बनाई तालिका से जिस फार्मूले को छांटकर फसल की बुनियादी मौजूदा लागत कूती गई है, वह दोषपूर्ण साबित होती रही है।
2013-14 के बीच पूर्ववर्ती सरकार ने भी रबी की सभी फसलों की लागत पर 50 फीसदी बढोतरी की थी और तब फसलों पर किसान की मूल लागत कम होने से गेहूं की खरीद पर उसे 106 फीसदी और रेपसीड एवं सरसों के तेल पर 133 फीसदी अधिक दाम मिले थे। आज लागत बढऩे से यह वृद्धि कुल 112 प्रतिशत और 88 प्रतिशत ठहरेगी। खरीफ की फसल अभी आनी है और उसमें भी किसान को पिछले सालों जितना लाभ देने के लिए आज सरकार को धान पर 11 प्रतिशत, कपास पर 18 प्रतिशत और ज्वार पर 41 प्रतिशत तक न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना होगा। इसके लिए आवंटित राशि ऊंट के मुंह में जीरा दिख रही है।

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