लखनऊ में संदिग्धों की बसी है अलग ‘दुनिया’

अजय कुमार
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ अवैध कब्जों और अतिक्रमण से तो जूझ ही रही है, इसके अलावा एक और संकट भी है जिसे प्रदेश की सुरक्षा के लिये बड़ा खतरा कहा जा सकता है। शासन-प्रशासन की खाऊ नीति के चलते राजधानी की सरकारी जमीन के बड़े हिस्से पर पूरी की पूरी अवैध बस्तियां खड़ी हो गई हैं। इन बस्तियों में रहने वालों की पहचान और क्रिया-कलाप पूरी तरह से संदिग्ध हैं। दिखावे के लिये तो यह कूड़ा बीनने और कबाड़ बटोरने का काम करते हैं, लेकिन इनके तार आपराधिक और देश विरोधी शक्तियों से भी जुड़े बताये जाते हैं। यह लोग अपने आप को आसाम का नागरिक बताकर अपनी असली पहचान गुप्त रखते हैं, जबकि आसाम के निवासी होने का कोई प्रमाणिक दस्तावेज इनके पास नहीं हैै। वोट बैंक की सियासत के चलते इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर इनसे पूछताछ भी नहीं हो पाती है। चाहें सरकार कांग्रेस की रही हों या फिर सपा-बसपा की।
खुफिया तंत्र इनको लखनऊ ही नहीं पूरे प्रदेश के लिये खतरा मानता है। इसमें कथित रोहिंग्या शरणार्थी से लेेकर बंग्लादेशी,पाकिस्तानी, अफगानिस्तानी सभी शामिल हैं, जिन्होंने चोरी-छिपे लखनऊ में अपनी अलग ‘दुनिया’ बसा रखी हैं। यह लोग समाज से कटे रहते हैं इसलिये उनके बारे में आसानी से किसी को कुछ पता भी नहीं चल पाता है। खुफिया विभाग अनेकों बार कुछ खास मौकों पर इनके चलते शांति – व्यवस्था बिगडऩे का खतरा जता चुका है, लेकिन वोट बैंक के सौदागरों की वजह से प्रशासन के हाथ बंधे नजर आते है। हाल ही में गणतंत्र दिवस के मौके पर खुफिया सूत्रों ने इनपुट दिया था कि गणतंत्र दिवस पर राज्य में रोहिंग्या शरणार्थियों के कारण खतरा पैदा हो सकता है। इसके बाद एडीजी आनंद कुमार ने सभी जिलों को सुरक्षा व्यवस्था के संबंध में अलर्ट रहने को कहा था।
अवैध तरीके से राजधानी में डेरा डाले इन लोगों को लखनऊ विकास प्राधिकरण(एलडीए) और नगर निगम के साथ-साथ स्थानीय पुलिस और कुछ सफेदपोश नेताओं के संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते राजधानी लखनऊ अवैध रूप से रह रहे लोगों का हब बनता जा रहा है। तमाम विभागों की सैकड़ों एकड़ जमीन पर ऐसे लोगों ने कब्जा जमा रखा है, जिनकी नागरिकता और गतिविधियां दोनों संदिग्ध हैं। प्राधिकरण ने हाल ही में अपनी जमीन पर अवैध कब्जों को लेकर सर्वे किया था। सर्वे के दौरान अवैध कब्जा करने वाले लोगों की नागरिकता सहित उनसे जुड़े तमाम कागजों की भी जांच की गई, जिसमें पहली नजर में खामियों के साथ-साथ फर्जीबाड़ा ही नजर आ रहा है। पुराने शहर से लेकर पॉश कालोनियों तक में मकडज़ाल की तरह फैली इन झुग्गी-झोपड़ीनुमा बस्तियों में रहने वाले लोगों को लेकर कई बार शासन-प्रशासन चिंता जता चुका है, लेकिन इनको यहां से हटाने के लिये अभी तक कोई कारगर योजना नहीं बन पाई है। यहां रहने वाले अधिकांश खुद को असम के बरपेटा जिले का बताते हैं।
लखनऊ से गुजरती रेलवे लाइन के किनारे की सरकारी जमीन इन लोगों का सबसे आसान ठिकाना बन जाता है। इनके द्वारा पहले हल्के-फुल्के तरीके से जमीन पर कब्जा किया जाता है, इसके बाद पक्के निर्माण तक हो जाते हैं। कई जगह प्राधिकरण के बिक नहीं पाये व्यावसायिक भूखंड पुराने वाहनों को काटने का बाजार बन गये है। प्रियदर्शनी कालोनी, इंजीनियरिंग कॉलेज, त्रिवेणी नगर, रिंग रोड, चिनहट, सीतापुर रोड, गोमती नगर, फैजाबाद रोड, कानपुर रोड के आसपास जहां भी कुछ जगह है, वहां अवैध बस्तियों में संदिग्ध नागरिकों की बस्ती तेजी से बढ़ रही है। स्थानीय लोग अपराधों को लेकर भी इन संदिग्ध नागरिकों पर ही सवाल उठाते रहे हैं। एलडीए के अनुसार यहां रहने वाले करीब 40 हजार लोगों की नागरिकता संदिग्ध है। बांग्लादेशी और रोहिनियां घुसपैठियों पर लगाम लगाने के लिये सरकार की तरफ से सभी जिलों के पुलिस प्रभारियों के साथ स्थानीय अभिसूचना इकाईयों को निर्देश दिए गए हैं कि वह इनकी पहचान तीन स्तर पर करें। पहला, जिनके पास पहचान पत्र नहीं हैं। दूसरा, जिनके पास पहचान पत्र हैं, लेकिन दूसरे राज्यों या जिलों के। ऐसे लोगों के पहचान पत्रों का वेरीफिकेशन करवा कर उन्हें चिन्हित किया जाए। तीसरा, ऐसे लोगों की पहचान जिनके पास जहां रहते हैं वहां का पहचान पत्र है लेकिन, शक है कि वह बंग्लादेशी या रोहिनियां मुसलमान हैं। ऐसे लोगों के भी पहचान पत्रों का प्रमाणित करवाया जाए और एलआईयू के जरिए उनकी गतिविधियों का पता चलाया जाए।

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