झोलाछाप डॉक्टर और स्वास्थ्य महकमा

सवाल उठता है कि झोलाछाप डाक्टरों में कानून और प्रशासन का भय क्यों नहीं है! उन्नाव में जिस तरह की घटना हुई वह एक बानगी है। पूरे देश में झोलाछाप डॉक्टरों की भरमार है। अशिक्षा और गरीबी के अभाव में लोग झोलाछाप डॉक्टरों की शरण में जाते हैं और ये तथाकथित डॉक्टर उनके सीधेपन का फायदा उठाते हैं।

पिछले कुछ दिनों से उन्नाव जिला चर्चा में है। एक झोलाछाप डॉक्टर की करतूत की वजह से बांगरमऊ तहसील में कई लोग एचआईवी संक्रमित हो गए। प्रति वर्ष सरकार एचआईवी के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करती है फिर भी इस तरह की घटनाएं हो रही है तो निश्चित ही यह चिंता का विषय है। एक तथाकथित डॉक्टर ने एक ही निडिल से इंजेक्शन लगा कर कई लोगों को एचआइवी संक्रमित कर डाला। पिछले दस महीनों के दौरान पचास से ज्यादा लोग इसका शिकार हुए हैं। यहां सवाल उठता है कि झोलाछाप डाक्टरों में कानून और प्रशासन का भय क्यों नहीं है!
उन्नाव में जिस तरह की घटना हुई वह एक बानगी है। पूरे देश में झोलाछाप डॉक्टरों की भरमार है। अशिक्षा और गरीबी के अभाव में लोग झोलाछाप डॉक्टरों की शरण में जाते हैं और ये तथाकथित डॉक्टर उनके सीधेपन का फायदा उठाते हैं। सबसे बड़ी विडंबना तो यह कि पूरे देश में झोलाछाप डॉक्टरों का धंधा प्रशासन के नाक के नीचे ही फलफूल रहा है। उन्नाव का भी मामला ऐसा ही है। यह झोलाछाप एक मरीज से इंजेक्शन लगाने के सिर्फ दस रुपए लेता था। वह कई सालों से एक कमरे में दवाखाना चला रहा था लेकिन हैरान करने वाली बात तो यह है कि प्रशासन का कभी इस पर ध्यान नहीं गया।
उन्नाव में जो लोग एचआईवी संक्रमित पाये गए हैं वह बहुत ही गरीब लोग हैं। पैसा देकर इस बीमारी का इलाज कराना इनके बूते से बाहर है। अभी तो यह आंकड़ा 50 पार हुआ है लेकिन भविष्य में यह बढ़ सकता है। दरअसल ये झोलाछाप डॉक्टर इस बदहाल तंत्र की ही देन हैं। आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है। ग्रामीण इलाकों में हालात कैसे हैं, सरकारी आंकड़े ही इसकी तस्वीर पेश करने के लिए पर्याप्त हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का आलम यह है कि प्रदेश के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के अस्सी फीसद से ज्यादा पद खाली हैं। प्रदेश में मात्र 484 विशेषज्ञ काम कर रहे हैं, जबकि जरूरत 3288 की है। जबकि तय मानक के मुताबिक पचास हजार की आबादी पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए, लेकिन असलियत यह है कि एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर इससे कई गुना ज्यादा बोझ है। सवाल है कि ऐसे में ये सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गरीबों को स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं कैसे दे पाएंगे? उत्तर प्रदेश ही नहीं, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी स्वास्थ्य सेवाओं की हालत कमोबेश ऐसी ही है, जहां डॉक्टरों और आबादी का अनुपात भयावह तस्वीर पेश करता है। इसलिए गरीब आदमी झोलाछाप की शरण में जाने को मजबूर है।

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