कश्मीर में अग्नि परीक्षा

तरुण विजय
जम्मू-कश्मीर के राजौरी सेक्टर में कार्यरत कैप्टन कपिल कुंडु अभी अपना तेइसवां जन्मदिन मनानेवाले थे कि गत रविवार राजौरी-पुंछ क्षेत्र में वे पाकिस्तानी गोलीबारी में शहीद हो गये। उनकी मां सुनीता कुंडु ने आंसू पोंछते हुए कहा कि यदि उनके दूसरा बेटा भी होता, तो वे उसे भी सेना में भेजतीं। धन्य है ऐसा पुत्र और धन्य है ऐसी मां। लेकिन, सवाल इससे बड़े हैं- यह सब आखिर कब तक देश देखेगा, झेलेगा?
इससे पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस ने गढ़वाल राइफल्स की यूनिट तथा उसके मेजर आदित्य के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की- हत्या और गोलीबारी के आरोप में। जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में भाजपा विधायकों ने इसका जिक्र किया और रपट दर्ज करने को गलत बताया, लेकिन जम्मू-कश्मीर सरकार, राज्यपाल (जो देश की सेनाओं के सर्वोच्च प्रमुख राष्ट्रपति के प्रतिनिधि होने के नाते जम्मू-कश्मीर में सैनिकों के संरक्षक हैं), मुख्यमंत्री, सारे लोग एक तरह से सन्नाटा ओढ़े रहे। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री ने जो कहा, उसका कोई अर्थ नहीं था। पत्थरबाजों पर दायर मुकदमे वापस लेना और देश की रक्षा के लिए प्राणों की बलि देनेवाले जवानों तथा सेना की यूनिट पर धारा 302 का मुकदमा दर्ज करना, यह बताता है कि कश्मीर में कुछ ठीक नहीं हो रहा है। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सैनिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर पाकिस्तान में जलसा करवा दिया। यह देश-विभाजक काम जम्मू-कश्मीर पुलिस ने क्यों किया? मेजर आदित्य के विरुद्ध 302 की धारा पूरे भारत की जनता और संविधान पर तमाचा है। जो इस पर सन्नाटा ओढ़े, उसको आप क्या कहेंगे?
हर रोज शहादत, हर रोज शोक संदेश, हर रोज श्रद्धा सुमन। यह देश का गौरव है कि यहां रणबांकुरे और देशभक्त नौजवान भारत मां की रक्षा के लिए कुर्बान होने को हरदम तैयार रहते हैं। लेकिन जरा सोचिये, सन 1947 में मिली खंडित-भारत की आजादी के तुरंत बाद से आज तक हम लगातार पाकिस्तान द्वारा लहू-लुहान किये जाते आ रहे हैं। कश्मीर का एक तिहाई गया, गिलगित-बाल्टिस्तान गया, अक्साई चिन चीन के कब्जे में गया। चार युद्ध अलग और हर दिन के युद्ध अलग। गत सप्ताह मैं जालंधर में हिंद समाचार पत्र समूह द्वारा शहीद परिवारों की सहायता के लिए आयोजित कार्यक्रम में विशेष आमंत्रित था। इस समूह के संपादक जगतनारायण जी और उनके पुत्र तथा संपादक रमेशचंद्र जी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के शिकार हुए। इतना ही नहीं, 62 संवाददाता-रिपोर्टर-हॉकर भी शहीद हुए। वे हर साल शहीद परिवारों को मदद भेजते हैं। 1983 से अब तक 462 ट्रक राहत-सहायता सामग्री तथा 16 करोड़ रुपये से ज्यादा वितरित किये गये हैं। यह जज्बा गौरव योग्य है। लेकिन, क्या यह एक शक्तिशाली देश की निशानी है? क्या चीन, जापान, रूस, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस- हर रोज के युद्ध, हर रोज के आतंकवाद, हर रोज होने वाले शहीदों की याद में श्रद्धांजलि समारोह करते रहते हैं? क्या शहादत एवं सीमावर्ती युद्ध- हर रोज का न खत्म होनेवाला यह सिलसिला होना चाहिए?
आखिर वह दिन कब आयेगा, जब हर दिन किसी जवान, मेजर, कैप्टन की शहादत हमारी खबरों का आम, हर रोज का रुटीन हिस्सा बना करें? युद्ध होना है, तो एक दिन हो, लेकिन यह रोज-रोज का युद्ध खत्म हो। यह भूराजनीतिक विशेषज्ञों के लिए सोचने की बात है। आखिर में जवान और अधिकारी हमारे-आपके घरों से ही तो सेना में जाते हैं। उनके लिए शहादत गौरव का विषय है। हम खुद सोचें कि हमारे लिए उनका इस तरह हर दिन शहीद होना- एक अभिभावक के नाते किसी निर्णायक क्षण तक पहुंचनेवाला होना चाहिए या नहीं? भारत पहले विदेशी आक्रमणों का शिकार हुआ- सदियों तक। फिर सीमा के दोनों ओर पड़ोसी देशों के हमलों का शिकार हुआ। भीतरी आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवाद एवं कश्मीर से उत्तर पूर्वांचल तक व्याप्त विद्रोह और अराजक तत्वों का खूनी खेल भारत को विकास के मार्ग पर एकजुट हो टिकने ही नहीं देता। भारत के जो संसाधन आम आदमी की जिंदगी बेहतर बनाने में लग सकते हैं, उनका एक बहुत बड़ा हिस्सा इन भीतरी एवं सीमावर्ती- हर दिन के युद्धों में लगता है।
क्या यह संभव नहीं कि सुरक्षा तथा आपसी सद्भाव की रक्षा के नाम पर अपने सारे मतभेदों को भुला करके देश में राजनीतिक मतैक्य बने और अपनी-अपनी विचारधाराओं तथा कार्यक्रमों की राजनीतिक को गौण रखते हुए ऐसी राष्ट्रीय सहमति उभरे, जहां सैनिक के सम्मान तथा नागरिक की रक्षा सर्वोपरि हो?

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