बलात्कार: मृत्युदंड पर सहमति को बढ़ता दबाव

अनूप भटनागर

देश के विभिन्न हिस्सों में अबोध बच्चियों और नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण की लगातार बढ़ रही घटनाओं के बीच ही दिल्ली में मात्र आठ महीने की बच्ची को उसके ही रिश्तेदार द्वारा अपनी हवस का शिकार बनाये जाने की घटना ने सबको स्तब्ध कर दिया है। इस घटना के बाद एक बार फिर 12 साल तक की बच्चियों के यौन शोषण की घटनाओं की जांच और मुकदमों की सुनवाई छह महीने के भीतर पूरा करने और ऐसे बलात्कारी के लिये कानून में मौत की सजा का प्रावधान करने की मांग जोर पकडऩे लगी है।
बेहतर होगा कि इस तरह की बर्बर घटनाओं के मुकदमों की सुनवाई त्वरित अदालतों में हो ताकि अपराधी को जल्द से जल्द सजा मिल सके। वैसे भी निचली अदालत से सजा मिलने के बाद अंतिम फैसला आने में कई साल लग जाते हैं। इसकी वजह, निचली अदालत के बाद उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई तथा शीर्ष अदालत के निर्णय पर पुनर्विचार होता है। इसके बाद सुधारात्मक याचिका दायर करने और मौत की सजा होने की स्थिति में राष्ट्रपति के यहां क्षमा याचना के विकल्प अपनाने में भी समय लगता है। निर्भया कांड के दोषियों का मामला अभी भी हमारे सामने है। छह साल बाद भी चारों वयस्क दोषी अभी जेल में हैं जबकि उनकी पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई होनी है। उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक बच्चियों को वासना का शिकार बनाये जाने की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है। शायद यही वजह है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 15 साल से कम आयु की लड़कियों से बलात्कार के अपराध के लिये मौत की सजा का प्रावधान करने के लिये राज्य सरकार से आग्रह किया तो कर्नाटक सरकार भी ऐसे अपराध के लिये मृत्युदंड की सजा के प्रावधान पर विचार कर रही है। हां, इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार सबसे आगे निकल गयी, जिसने पिछले साल चार दिसंबर को ही विधानसभा से इसके लिये विधेयक पारित कराया। राजस्थान सरकार और हरियाणा सरकार भी मध्य प्रदेश की तर्ज पर ही कानून बनाकर मृत्युदंड का प्रावधान करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह महज संयोग ही है कि इसके लिये कानून बनाने की दिशा में कदम उठाने वाले तीनों राज्य भाजपा शासित हैं जहां ऐसे अपराधों में तेजी से वृद्धि हुई है लेकिन अचरज की बात है कि भाजपा के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ऐसे अपराध के लिये मौत की सजा के पक्ष में नहीं है। स्थिति की गंभीरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि ऐसी अधिकांश घटनाओं में आरोपी या दोषी कोई न कोई निकट का रिश्तेदार या परिचित ही पाया जा रहा है।
इस समय, दिल्ली में आठ महीने की बच्ची के यौन शोषण का मामला सुर्खियों में है। हवस का शिकार बनने वाली अबोध बच्चियों की जिंदगी बचाने के लिये तो चिकित्सक जी-जान लगा देते हैं लेकिन बलात्कार की शिकार होने वाली 10 से 15 साल की लड़कियों की स्थिति के बारे में भी अधिक संजीदगी से विचार की आवश्यकता है। आठ महीने की बच्ची से बलात्कार की घटना के परिप्रेक्ष्य में उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान पिछले सप्ताह केन्द्र की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने कुछ ऐसा ही संकेत दिया। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष नरसिम्हा ने कहा, ‘मौत की सजा हर अपराध का जवाब नहीं है।’ केन्द्र की ओर से इस तरह का जवाब चौंकाने वाला है क्योंकि मौजूदा सरकार लगातार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा बुलंद कर रही है और वहीं बच्चियां हवस का शिकार बन रही हैं। नाबालिग लड़कियों, विशेषकर अबोध बच्चियों के यौन शोषण की बढ़ती घटनाओं से चिंतित शीर्ष अदालत ने अब केन्द्र सरकार से जानना चाहा है कि देश भर में इस तरह के कितने मामले अदालतों में लंबित हैं। इस तरह की जानकारी मांगने का मकसद ऐसे सभी मुकदमों की सुनवाई तेजी से सुनिश्चित करने के तरीके खोजना है। नाबालिग लड़कियों और अबोध बच्चियों से बलात्कार की घटनाओं के अपराधियों को मौत की सजा देने का प्रावधान तो समय की पुकार है लेकिन इससे पहले तो पुलिस को जवाबदेह और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। इसकी वजह राज्यों में महिलाओं के प्रति ही नहीं बल्कि दूसरे अपराधों के प्रति स्थानीय स्तर पर पुलिस की संवेदनहीनता इस सीमा तक बढ़ गयी है कि प्राथमिकी दर्ज कराने के लिये अक्सर पीडि़त और उनके परिवारों को पुलिस के उच्च अधिकारियों और अदालत तक से गुहार लगानी पड़ रही है जो शर्मनाक है। फिलहाल तो यह देखना है कि अबोध बच्ची से यौन शोषण की इस घटना के बाद ऐसे अपराधों की जांच प्रक्रिया और मुकदमे की कार्यवाही छह महीने के भीतर पूरी करने के बारे में उच्चतम न्यायालय किस तरह के दिशा-निर्देश देता है।

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