नकल विहीन परीक्षा परीक्षार्थी और सिस्टम

सवाल यह है कि क्या नकल नहीं होने के कारण छात्रों ने परीक्षा छोड़ दी है? क्या छात्रों के भविष्य को नकल का दीमक चाट रहा है? आखिर परीक्षा में नकल की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या इसके लिए हमारी गुणवत्ताहीन शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है? क्या पूरे सिस्टम को बदलने का वक्त आ चुका है?

यूपी बोर्ड की हाईस्कूल व इंटर की परीक्षाएं शुरू हो चुकी हैं। बोर्ड परीक्षा के पहले ही दिन एक लाख अस्सी हजार छात्रों ने परीक्षाएं छोड़ दीं। इसे सरकार द्वारा नकल विहीन परीक्षा कराने की कोशिशों के परिणाम के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि यह कोशिश बहुत कामयाब होती नहीं नजर आई। कई परीक्षा केंद्रों में नकल होने की सूचना भी मिली है। सवाल यह है कि क्या नकल नहीं होने के कारण छात्रों ने परीक्षा छोड़ दी है? क्या छात्रों के भविष्य को नकल का दीमक चाट रहा है? आखिर परीक्षा में नकल की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या इसके लिए हमारी गुणवत्ताहीन शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है? क्या पूरे सिस्टम को बदलने का वक्त आ चुका है? क्या युवाओं के भविष्य को चौपट होते हुए देखा जा सकता है? और अंत में इस सबका असली गुनहगार कौन है?
पूरे प्रदेश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की चूलें हिल चुकी हैं। सरकारी विद्यालय तमाम बुनियादी सुविधाओं से जूझ रहे हैं। रही सही कसर शिक्षकों की कमी पूरी कर दे रही है। जहां शिक्षक हैं भी वहां शिक्षा का स्तर बेहद निम्न स्तर का है। परीक्षा के आने तक छात्रों का पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो पाता है। शिक्षकों का समय-समय पर मूल्यांकन नहीं होने के कारण भी शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है। यह स्थिति एक दिन में नहीं आई है। एक समय था जब प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन इसे निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए योजनाबद्ध तरीके से नष्ट किया गया। सत्तारूढ़ सरकारें भी इसके लिए जिम्मेदार रही हैं। सरकारों ने शिक्षा गुणवत्ता पर कोई ध्यान नहीं दिया। वे जैसा चल रहा है, वैसा चलने की नीति पर चलती रहीं। शिक्षा के निजीकरण ने सरकारी शिक्षा व्यवस्था को भी चोट पहुंचाई। गुणवत्ता युक्त शिक्षा के नाम पर कांन्वेंट स्कूल खुल गए। लिहाजा लोगों ने अपने बच्चों को यहां पढ़ाने में भलाई समझी। इसका परिणाम यह हुआ कि आर्थिक रूप से कमजोर तबके के छात्र ही सरकारी शिक्षण संस्थानों में पढऩे के लिए पहुंच रहे हैं। लचर शिक्षा व्यवस्था में छात्र येन केन प्रकारेण परीक्षा पास करने की जुगत लगाते हैं। इसने परीक्षाओं में नकल को प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे नकल माफिया सक्रिय हुए और यह एक कारोबार बन गया। कुल मिलाकर यदि सरकार वाकई नकल विहीन परीक्षा कराना चाहती है तो उसे शिक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करना होगा। शिक्षकों को जवाबदेह बनाना होगा ताकि वे छात्रों में शिक्षा के प्रति ललक पैदा कर सकें। अन्यथा प्रदेश के लाखों युवाओं का भविष्य चौपट होता रहेगा।

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