बालू से तेल निकाल लेते हैं दिव्य पुडिय़ा वाले साहबव

शहर को चमकाने की जिम्मेदारी संभाल रहे दिव्य पुडिय़ा वाले साहब के उपजाऊ दिमाग का तोड़ खोजे नहीं मिलेगा। ऐसा दिमाग विरले ही पाते हैं। दिव्य पुडिय़ा के बल पर वे बालू से भी तेल निकाल लेते हैं। कंबल ओढक़र घी पीने में उन्हें महारत हासिल है। वे लहरें गिनकर पैसा कमाने का भी हुनर जानते हैं। मोटी-मोटी फाइलों को देख उनका दिल बल्लियों उछल जाता है। फाइलों पर चिडिय़ा बैठाने के नाम पर वे वारे-न्यारे कर देते हैं जी और बगल वाले को हवा भी नहीं लगती है। उनके इस दिगाम का सभी लोहा मानते हैं। मातहतों और परिचितों के लिए उनका व्यक्तित्व किसी रहस्य रोमांच कथा से कम नहीं है। उनको देखकर हैसियत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। अपने इसी उपजाऊ दिमाग से उन्होंने बेहिसाब संपत्ति की खेती की है। दिलजले उनकी संपत्ति की आज तक थाह लगा रहे है, लेकिन बात बनी नहीं। लिहाजा कोई दो सौ तो कोई डेढ़ सौ करोड़ का अंदाजा लगा रहा है। इसे कहते हैं एड़ा बनकर पेड़ा खाना।

Pin It