महंगी पड़ी साहबी

सेहत विभाग की बडक़ी कुर्सी पर काबिज एक साहब को अपने मातहत पर रौब झाडऩा महंगा पड़ गया। मातहत ने ऐसी खरी-खोटी सुनाई की पूछिए मत। अपने मातहत का तेवर देख साहब की घिग्घी बंध गई। बेचारे बगलें झांकने लगे। साहब को खरी-खोटी का उतना मलाल नहीं है जितना इसके सार्वजनिक होने का है। अब हालात यह है कि साहब घर से सीधे अपने केबिन में दाखिल होते हैं और केबिन से सीधा घर जाते हैं। साहब की बदले चाल-ढाल को देखकर कर्मचारी भी बम-बम हैं। कुछ दिन के लिए ही सही भारी भरकम डोज का असर हो होगा ही। साहब भी अब किसी को मुंह लगाने से कतरा रहे हैं। इसे कहते से शेर को सवा शेर मिलना।

 

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