ऑल इज वेल

राजधानी में चोरों के मजे हैं। कभी घर में घुसकर हाथ साफ कर रहे हैं, कभी दुकान का शटर तोडक़र माल उड़ा रहे हैं। हाथ की सफाई ऐसी की मजाल बगल में सो रहे आदमी की नींद में खलल पड़ जाए। चोरों की इस सफाई से लोग परेशान है। जरा सी खटपट पर उठकर चोर-चोर चिल्लाने लगते हैं। लेकिन अपने थानेदार साहब को इसकी कोई चिंता नहीं है। वे फुल मस्ती में हैं। सिपाही जी भी एक कुर्सी पर रूमाल डाले ऊंघ रहे हैं। कहां तक दौड़े चोरों के पीछे। न चोर हाथ आते हैं न माल हाथ आता है। कोई सफलता की गारंटी दे तो चोरों के पीछे भागे। बड़े अपराधों से थानेदार साहब की नींद उड़ी है लेकिन वे ऑल इज वेल का डंका पीट रहे हैं।

 

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