विकास के लिए वित्तीय घाटा भी जरूरी

भरत झुनझुनवाला

वित्तमंत्री ने आगामी वर्ष के बजट में वित्तीय घाटे पर नियंत्रण रखने का क्रम जारी रखा है। वर्ष 2013-14 में सरकार का वित्तीय घाटा देश की आय का 4.5 प्रतिशत था। चालू वर्ष 2017-2018 में यह 3.5 रह गया है। आगामी वर्ष में इसे और घटाकर 3.2 प्रतिशत पर लाने की योजना है। वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने का मंत्र अस्सी के दशक में विश्व बैंक ने दक्षिण अमेरिका के संदर्भ में बनाया था। उस महाद्वीप की कई सरकारें अति भ्रष्ट थीं। उनके नेता विश्व बैंक से ऋण लेकर, रकम का रिसाव कराकर स्विस बैंक के अपने व्यक्तिगत खातों में जमा करा रहे थे। तब विश्व बैंक ने मंत्र बनाया कि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को निजी निवेश के आधार पर बढ़ाया जाये। निजी निवेशकों द्वारा लाई गई रकम को मेजबान देश के नेता रिसाव कराकर गबन नहीं कर पायेंगे।

प्रश्न था कि निजी निवेशकों को कैसे आकर्षित किया जाये? विश्व बैंक ऋण न दे तो भी मेजबान सरकार के नेता नोट छापकर रकम का गबन कर सकते थे। ऐसे में विदेशी निवेशकों को भरोसा नहीं बनता था, इसलिये वित्तीय घाटे पर नियंत्रण का मंत्र बनाया गया। विश्व बैंक ने सलाह दी कि विकासशील देशों की सरकारें वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करें। वित्तीय घाटा कम होगा तो अर्थव्यवस्था स्थिर रहेगी और विदेशी निवेश आयेगा। वित्तीय घाटा वह रकम होती है जो सरकार ऋण लेती है। वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने के लिये सरकार को अपने कुल खर्च कम करने होंगे। इन्हें कम करने पर सरकार को निवेश भी कम करना होगा। इससे विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता था। परन्तु विश्व बैंक ने कहा कि निजी विदेशी निवेश आयेगा और आर्थिक विकास सुचारु रूप से चलता रहेगा। अत: वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने के मंत्र के पीछे सोच थी कि मेजबान सरकार भ्रष्ट होने से सरकारी निवेश पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिये सरकारी निवेश घटाओ और निजी निवेश बढ़ाओ। वित्तमंत्री द्वारा विश्व बैंक के इसी मंत्र का अनुपालन किया जा रहा है। इसी दिशा में सरकार द्वारा मेक इन इंडिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। सोच है कि बहुराष्टï्रीय कम्पनियां भारत में निवेश करेंगी और हमारी अर्थव्यवस्था चल निकलेगी। अस्सी के दशक में जब वित्तीय घाटे का मंत्र बनाया गया था, तब और आज की परिस्थिति में बहुत अंतर है। उस समय बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चीन में फैक्टरियां लगा रही थीं, चूंकि चीन में वेतन कम थे। आज चीन तथा भारत में वेतन बढ़ रहे हैं, इसलिये सस्ते वेतन का आकर्षण कम हो गया है। बीते दशक में आटोमेटिक मशीनों से उत्पादन होने लगा है। रोबोट द्वारा कार बनाई जा रही है। मेन्यूफेक्चरिंग में श्रम की जरूरत कम हो गयी है। तमाम फैक्टरियां विकासशील देशों से वापस यूरोप एवं अमेरिका को जा रही हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनी में 10,000 श्रमिक हों तो सस्ते वेतन का गहरा प्रभाव पड़ता है। उसी कम्पनी में केवल 100 श्रमिक हों तो उन्हें अधिक वेतन देने का कम प्रभाव पड़ता है। इसलिये विदेशी निवेश भारत में नहीं आ रहा है। एक और कारण है। वर्तमान में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तकनीकी आविष्कार हो रहे हैं। अर्थव्यवस्था गतिमान है। वहां के केन्द्रीय बैंक ने ब्याज दरों को बढ़ाना शुरू कर दिया है। विदेशी निवेशकों को अब अमेरिका के सुरक्षित वातावरण में पर्याप्त आय मिल रही है, इसलिये उनका भारत जैसे विकासशील देशों की तरफ रुझान कम हो गया है। वित्तमंत्री के सामने दो रास्ते खुले थे। एक रास्ता था कि सरकारी निवेश को नियंत्रण में रखते, वित्तीय घाटा कम बनाये रखते और विदेशी निवेश के भरोसे भारतीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाते। दूसरा रास्ता था कि सरकारी निवेश बढ़ाते, वित्तीय घाटा बढऩे देते और घरेलू निवेश के सहारे अर्थव्यवस्था को बढ़ाते। वित्तमंत्री ने पहले रास्ते को चुना है। वित्तीय घाटे को कम करने का प्रयास जारी है जैसा प्रारम्भ में बताया गया है। परन्तु यह रास्ता सफल नहीं है। विदेशी निवेश धीमी गति से ही आ रहा है। घरेलू निवेश भी कम हो रहा है। निवेश के दोनों स्रोत ढीले पड़े हुए हैं। हमारी अर्थव्यवस्था 7 प्रतिशत की विकास दर पर ही अटकी हुई है। वित्तमंत्री को वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने के विश्व बैंक के मंत्र को त्याग कर घरेलू निवेश बढ़ाना चाहिये था। वर्तमान एनडीए सरकार मूल रूप से ईमानदार है। विदेशी और घरेलू निवेश दोनों में सुस्ती के बावजूद हमारी विकास दर 7 प्रतिशत की दर पर है। वर्तमान सरकार ने सरकारी रकम के रिसाव पर लगाम लगाई है। इस परिस्थिति में ऋण लेकर निवेश करना चाहिये था। दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है। वर्तमान 7 प्रतिशत विकास दर विश्व के प्रमुख देशों में अधिकतम हो तो भी बात नहीं बनती है। नब्बे के दशक में चीन ने 13 प्रतिशत की विकास दर हासिल की थी। आज हमारा लक्ष्य 15 प्रतिशत विकास दर हासिल करने का होना चाहिये। वित्तमंत्री को चाहिए कि वित्तीय घाटा नियंत्रित करने के विश्व बैंक के मंत्र को त्याग दें, ऋण लेकर सरकारी निवेश बढ़ायें।

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