बाजार में क्यों मच रहा है कोहराम

नित्येन्द्र द्विवेदी

वैश्विक बाजार से मिल रही प्रतिक्रियाओं का असर भारतीय शेयर बाजार पर समाप्त होता दिखायी दे रहा है। बजट 2018 पेश होने से मात्र एक सप्ताह पहले तक मार्केट रोजाना नयी ऊंचाइयां छू रही थी। देश का सबसे पुराने शेयर इंडेक्स बीएस ने अपने इतिहास में पहली बार 36000 और ट्रेडिंग इंडेक्स निफ्टी ने 11000 के ऊपर का स्तर छू लिया था। बीते वर्ष 6 दिसंबर को सेंसेक्स 32000 के स्तर पर था और 24 जनवरी पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा 36000 पर पहुंच गया। शेयर बाजार में 5 हफ्ते तक रैली बेरोकटोक जारी रही। लेकिन बजट पेश होने के बाद से ही शेयर बाजार की दिशा नीचे की ओर है। आलम यह है कि बीते शुक्रवार को बीएसई के संवेदी सूचकांक में 840 अंकों की गिरावट आई और निफ्टी भी 2.33 प्रतिशत यानी 256 अंक बंद हुआ। इस दिन बाजर में निवेशकों को 4.6 लाख करोड़ रुपए डूब गये।
भारतीय शेयर बाजारों की तेजी का देश की अर्थव्यवस्था से रिश्ता नहीं था। जीडीपी में बढ़त 4 साल के निचले स्तर पर थी, उद्योग जगत की हालत खस्ता, महंगाई दर में बढ़ोतरी और ब्याज दरें कम नहीं हो रही थीं, फिर भी बाजार भागे चले जा रहे थे। इसका जवाब था कि घरेलू बाजारों को तेजी की ऑक्सीजन विदेशी बाजारों से मिल रही थी। खासतौर पर अमेरिकी बाजार रोके नहीं रुक रहे थे। वहां की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और ट्रंप के नये टैक्स प्लान से उद्योग में जान आ गई है। अमेरिका में शटडाउन को खत्म करने पर समझौता होने से अमेरिकी कंपनियों के शेयर तेजी से बढ़ रहे थे। इसके अलावा जीएसटी दरों में बदलाव से भी खासे उत्साहित थे और तीसरी तिमाही में घरेलू कंपनियों के अच्छे लाभ से बाजार के हालात में सुधार आया था, लेकिन इसके बाद देश के निवेशकों खासकर छोटे निवेशकों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। नया बजट आने के बाद शेयर बाजार में रिकार्ड गिरावट का दौर शुरू हो चुका है। माना जा रहा है कि सरकार ने बजट में 10 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स और म्यूचुअल फंड के लाभ में 10फीसदी प्रतिशत टैक्स का जो ऐलान किया है वह बाजार को पसंद नहीं आया है। लेकिन एक फैक्टर और भी है वह सबसे बड़ा है। भारतीय बॉन्ड बाजार में यील्ड 12 महीने की ऊंचाई पर है जो मार्केट को नीचे की ओर ढकेल रहा है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ता है तो निवेशक जैसे बैंक, एफआईआई, घरेलू संस्थागत आदि शेयर बाजार से निकालकर बॉन्ड में पैसा लगाने लगते हैं। इससे बॉन्ड यील्ड तो बढ़ता है लेकिन शेयर बाजार में बिकवाली शुरू हो जाती है।
भारत में इस समय बॉन्ड यील्ड यानी बॉन्ड पर 12 महीने पर मिलने वाला ब्याज रिकॉर्ड 7.55 फीसदी के आसपास है। यही हालात अमेरिका में भी हैं। वहां 10 साल के सरकारी बॉन्ड पर यील्ड 2.8 फीसदी तक पहुंच गई है। जो अप्रैल 2014 के बाद उच्चतम स्तर है। बीते महीने के अंत में बाजार की तेजी लेकर स्टॉक एक्सचेंज एंड रेगुलेश कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) ने ब्रोकर्स को चेतावनी जारी की थी कि वे निवेशकों से अपने मार्जिन का ध्यान रखें। बीते हफ्ते सेंसेक्स ने 35,000 और निफ्टी ने 11,000 के स्तर को पहली बार पार किया था। इस उछाल ने मार्केगेट रेगुलेटर की परेशानी बढ़ा दी थी। शेयर बाजार में 2008 में जारी तेजी के बीच आई गिरावट से निवेशकों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। सरकार ने बजट में आमदनी से ज्यादा खर्च करने का ऐलान किया है। ऐसे में रकम जुटाने के लिए सरकार को 6 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कर्ज लेना होगा। सरकार जब कर्ज लेती है तो रकम का बड़ा हिस्सा बॉन्ड जारी करके जुटाया जाता है। भारत में महंगाई दर बढऩे की आशंका है, ऐसे में हालात ऐसे बन रहे हैं कि रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ा सकता है। अमेरिका में भी कुछ ऐसा ही अंदेशा है। यूरोपीय और अमेरिकी सेंट्रल बैंकों से जो राहत पैकेज दिये जा रहे थे वे अब कम हो रहे हैं। अमेरिकी में सरकार ने भारी टैक्स कटौती कर आमदनी कम कर ली है यानी इससे वित्तीय घाटा बढ़ेगा। ऐसे में अमेरिका प्रशासन बॉन्ड से कर्ज जुटाएगा। इससे बॉन्ड यील्ड 4 साल के शीर्ष पर है। बॉन्ड यील्ड और शेयर बाजार के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। अगर शेयर बाजार में तेजी होती है तो बॉन्ड यील्ड घटती है। अगर बॉन्ड यील्ड बढ़ती तो शेयर बाजार गिरने लगता है। अगर बॉन्ड यील्ड 7 फीसदी है और तो शेयर बाजार में रिटर्न की गुंजाइश इससे 5फीसदी तक ज्यादा होनी चाहिए। यह एक्स्ट्रा 5 फीसदी शेयर बाजार में जोखिम के लिए है। मतलब हुआ कि शेयर बाजार में निवेश तभी फायदेमंद है जब कम से कम 12फीसदी रिटर्न मिले।

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