इतिहास के सच व मिथकों का द्वंद

शंभूनाथ शुक्ल
कुछ दिन पहले आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के चीफ असाउद्दीन ओवैसी ने मुसलमानों से अपील की थी कि वे भी राजपूतों की करणी सेना की तरह संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ का बायकाट करें। उन्होंने कहा था कि फिल्म में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को ठीक से नहीं दिखाया गया है। अब देखिए कि पद्मावत भारत में तो सकुशल रिलीज हो गई लेकिन मलेशिया ने खिलजी के उपहासास्पद चित्रण पर इस फिल्म को अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया। मलेशिया मुस्लिम बहुल देश है और इस फिल्म में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के ‘अतिरंजित’ चित्रण के कारण वहां के फिल्म सेंसर बोर्ड ने इसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी है।
अब तो ऐसा लगता है कि फिल्म की कामयाबी के लिए मानो स्वयं फिल्म निर्माता ने फिल्म के विवादास्पद होने की अफवाहें उड़वाईं। यह फिल्म 25 जनवरी को रिलीज हुई। उसके बाद से सन्नाटा छा गया, क्योंकि इस फिल्म में रानी पद्मावती या राजपूतों की आन-बान और शान के खिलाफ कुछ भी नहीं है। अब जो भी फिल्म देखकर लौट रहा है, वह या तो इस फिल्म की तारीफ करता है अथवा चुप रहता है। फिर क्यों लगभग साल भर से इस फिल्म को लेकर हंगामा बरपा होता रहा! लेकिन भीड़ का अविवेक देखिए कि हरियाणा के गुरुग्राम में फिल्म रिलीज होने के दो दिन पहले करणी सेना के लोगों ने एक नामी स्कूल की बस पर पथराव कर दिया। इससे हरियाणा में थियेटर मालिक इसे चलाने से डरते रहे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से फिल्म दिखाने का फैसला किया गया था, लेकिन अराजक लोगों ने कोर्ट के आदेश की अवहेलना की। तब तक किसी भी राज्य की पुलिस ने पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं दी थी।
फिल्म का नाम ‘पद्मावती’ से बदल कर मलिक मोहम्मद जायसी की रचना के आधार पर ‘पद्मावत’ कर दिया गया है। मगर इसके बावजूद करणी सेना ने इसे न चलने देने का ऐलान कर रखा था। यह सब देख कर लगता है कि इतिहास को पढऩे की चीज ही बनाए रखना चाहिए। उसका जब भी फिल्मीकरण या दृश्य नाट्य रूपांतरण करेंगे, तब-तब विवाद पैदा ही होंगे। उसमें कुछ न कुछ ऐसा होगा ही, जिससे किसी समुदाय, जातियों अथवा पन्थ विशेष के लोगों की भावनाएं आहत होंगी ही। ध्यान रखना चाहिए कि अतीत की मान्यताएं, तत्कालीन समाज के सच और उनके मिथक भिन्न थे। इसलिए न तो हम उस समाज का सत्य चित्रण कर सकते हैं और न ही उसके सौन्दर्यबोध को आज समझा जा सकता है। जब हर पीढ़ी अपनी नई पीढ़ी को यह बताती है कि हमारे जमाने में हम कितने आज्ञाकारी, विनम्र और विचारशील थे तब यह कैसे मान लिया जाए कि जिस ऐतिहासिक करेक्टर का वर्णन हम कर रहे हैं, वह सही ही होगा! मगर इतिहास की किताबें चित्तौड़ की रानी पद्मिनी के बारे में कुछ भी बताने के प्रश्न पर मौन हैं। अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला किया और रानी पद्मिनी ने अपनी सखियों समेत राजा के वीरगति पा जाने पर जौहर किया, यह तो पता चलता है, लेकिन पद्मिनी वही पद्मिनी हैं, जिनका वर्णन जायसी ने किया है, इसके ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं हैं। अब फिल्म देख चुके लोगों का कहना है कि फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे राजपूती शान को ठेस पहुंचती हो। उलटे फिल्म में राजपूतों की वीरता और उनकी आन को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया है। इसके अलावा सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के साथ रानी पद्मिनी का कोई दृश्य नहीं है और खिलजी को कुछ ज्यादा ही ‘खल’ दिखाया गया है तथा चित्तौड़ के कुलगुरु को विश्वासघाती। मगर विचित्र बात तो यह है कि फिल्म का विरोध राजपूतों की करणी सेना ने किया।
अब इतिहास में क्या और कैसा था, यह किसी को ज्ञात नहीं है। खिलजी ने चित्तौड़ पर चढ़ाई राज्य लिप्सा के तहत की थी। चित्तौड़ के युद्ध में राणा रत्नसेन वीरगति को प्राप्त होते हैं। हालांकि राजपूताने का इतिहास लिखने वाले कर्नल टॉड ने उन्हें रत्नसेन नहीं भीमसिंह (भीमसी) बताया है, जो चित्तौड़ के राणा लक्ष्मण सिंह के चाचा हैं। चूंकि लक्ष्मण सिंह नाबालिग हैं, इसलिए भीमसी उनके संरक्षक हैं। वे मारे गए और उनकी रानी ने जौहर कर लिया। यह ईस्वी सन1302 का वाकया है। इसके दो सौ वर्ष बाद उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में जायस के रहने वाले सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने एक काव्य-रचना की और उसमें अपनी कल्पना की उड़ान भरी। इस पद्मावत नामक काव्य में जायसी ने रानी पद्मिनी, रत्नसेन और सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी द्वारा उन्हें पाने की ललक की खातिर चित्तौड़ पर हमला किया जाना बताया है। काव्य कल्पना होता है और इतिहास एक हकीकत। संजय लीला भंसाली ने दोनों में घालमेल किया।

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