असाधारण चुनावी वर्ष का आगाज

योगेंद्र यादव

वर्ष 2018 चुनावी वर्ष होने जा रहा है, सिर्फ इसलिए नहीं कि इस वर्ष विधानसभा चुनावों के दो चक्र होनेवाले हैं, बल्कि वर्ष के अंत तक वक्त से पहले लोकसभा चुनाव भी कराये जा सकते हैं। इस वर्ष का बजट भाषण चुनावी भाषण होगा, आर्थिक सर्वेक्षण तथा सभी आर्थिक आंकड़े चुनावी चश्मे से देखे जायेंगे और मॉनसून की फुहारों की माप भी चुनावों पर ही असर डालेंगी। चीन और पाकिस्तान की सीमाओं की घटनाएं भी सत्तापक्ष के काम आयेंगी। अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि कोर्ट का निर्णय किसके हक में गया और चुनावी गणित में कितना हेरफेर कर सकेगा, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं। असम में राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण से संबद्ध संकट केवल मानवीय त्रासदी के लिए नहीं, बल्कि इसलिए जाना जायेगा कि राज्य से बाहर वह कितना चुनावी फायदा पहुंचा सकेगा।
इस वर्ष का चुनावी बुखार कुछ अलग किस्म का है। सत्ता पक्ष के लिए कोई भी चीज केवल तभी और उसी हद तक मतलब रखती है, जिस हद तक चुनावी आईने में वह अपना अक्स उभार सकती है। चुनावी वर्ष इसलिए भी असाधारण होने जा रहा है, क्योंकि दांव पर असंभव-सी बड़ी चीजें लगी हैं। यह न सिर्फ मोदी के लिए दूसरे कार्यकाल अथवा भारत के सियासी नक्शे पर भाजपा के मुकम्मल दबदबे की कोशिशों के नतीजे देगा। साथ ही राहुल और कांग्रेस का भविष्य, क्षेत्रीय गठबंधनों के युग की समाप्ति व समर्थन भारतीय गणतंत्र का भविष्य भी निर्धारित करेगा। मोदी-काल के आगाज के साथ ही हमारे गणतंत्र की बुनियाद पर अत्यंत प्रतिबद्ध प्रहार प्रारंभ हो गये।
कांग्रेस शासन के दौरान पहले ही सीमित कर दिये गये सभी स्वायत्त संस्थान अब आपातकाल के बाद सर्वाधिक बौने कर दिये गये हैं। मीडिया, खासकर टेलीविजन तो अब शासक दल की विस्तारित भुजाओं जैसी भूमिका में पहुंच गये हैं। विविधता तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धता को मजाक बना दिया गया है। इनमें से कुछ क्षतियां तो ऐसी हैं, जिनकी भरपाई भी संभव नहीं हो सकेगी। इस तरह यह वर्ष सिर्फ एक चुनावी दौड़ के मजे लेने का नहीं, वरन भारत के भविष्य को बनते-बिगड़ते हुए देखने का वर्ष भी होगा। इस वर्ष की अधिकतर सियासी अटकलें इन बिंदुओं के गिर्द घूमेंगी कि चुनाव कब होंगे, कैसे गठबंधन बनेंगे और क्या भाजपा के विरुद्ध एक महागठबंधन आकार ले सकेगा? इनकी बजाय हमें इस पर गौर करना चाहिए कि वे वास्तविक मुद्दे क्या हैं, जिन पर यह मुकाबला केंद्रित होगा। फिलहाल, भाजपा को अन्य विधानसभाओं के चुनावों में गुजरात से भी अधिक मुश्किलें झेलनी होंगी। कांग्रेस कर्नाटक को भी हिमाचल जैसी आसानी से उसे नहीं सौंपेंगी। मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में भाजपा का कोई जनाधार नहीं रहने की वजह से वहां उसकी सफलताएं दूर की कौड़ी ही होंगी। उसे राजस्थान तथा मध्यप्रदेश में सत्ता विरोध की गुजरात से तीव्रतर भावनाओं का सामना करना होगा। इसलिए उसके लिए आगे की राह इतनी आसान भी नहीं है। पर परिणाम प्रतिपक्ष की स्थिति पर निर्भर है। यह कहना उचित होगा कि देश को पिछले साढ़े तीन साल में कुछ मामूली किस्म के मोदी-विरोध और संसद में रस्मी शोरगुल के अलावा विपक्ष में कोई सारतत्व नहीं दिखा है। मुख्य विपक्षी पार्टी अब तक कोई सुसंगत दृष्टि अथवा विश्वसनीय चेहरे को आगे करने में विफल ही रही है। क्या हमें जमीन पर अब भी कोई संजीदा विपक्ष नजर आयेगा या वह एक बार फिर से उन्हीं पुरानी थकी-हारी व्यूह-रचनाओं के सहारे सुर्खियां बटोरने की फिराक में रहेगा? यूपी में सपा-बसपा के, ओडिशा में कांग्रेस तथा बीजद के, तमिलनाडु में कांग्रेस एवं डीएमके के गठबंधनों के साथ ही बिहार में नीतीश की विपक्ष-वापसी चुनावी समीकरणों में मूलभूत बदलाव ला सकती है।
इस चुनाव में दांव पर सिर्फ प्रधानमंत्री पद ही नहीं, पूरा गणतंत्र ही लगा है। यदि विपक्ष एक विश्वसनीय विकल्प देने में सफल रहता है, तो अपना नुकसान कम करने हेतु मोदी यह चुनाव पहले लाने को बाध्य होंगे, वरना वे अपने पूरे कार्यकाल तक बने रहेंगे। उनमें यह समझने की बुद्धिमत्ता है कि शासन के चार वर्षों के अंत में उनके पास मतदाताओं को, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाने को कुछ भी खास नहीं है। इसलिए यह चुनावी वर्ष कृषि संकट और युवा अशांति के रूप में सामने आयेगा अथवा सांप्रदायिक अशांति के रूप में। यह जिस दिशा में झुकेगा, उसी से चुनावी नतीजे और आगामी कुछ वक्त के लिए भारत की भवितव्यता तय होगी।

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