प्रेशर हार्न पर भी हो कार्रवा

अजय कुमार

हिन्दुस्तान में लाउडस्पीकर (देशी नाम भोंपू) जितना उपयोगी है, उतना ही इसका दुरुपयोग भी होता है। इसके ïिवभिन्न रूप अलग-अलग जगहों पर देखने को मिलते हैं। धर्म-कर्म, सियासत के मैदान से लेकर सामाजिक, शैक्षणिक कार्यक्रमों, शादी-ब्याह, प्राकृतिक आपदा या किसी दुर्घटना के समय के अलावा कुछ अलग रंग-ढंग के साथ वाहनों के कानफोड़ू सायरनों के रूप में भी यह अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहता है। लाउडस्पीकर से लोग संभवत: संत कबीरदास के समय से प्रताडि़त चले आ रहे होंगे, तभी तो कबीरदास ने कहा कि ‘कांकर पाथर जोड़ी के, मस्जिद लई चुनाय, ता चढि़ मुल्ला बांग दे, का बहरा हुआ खुदाय।’
भोंपू की उपयोगिता ने उसे ‘अलंकार’ बना दिया है। आज की तारीख में भोंपू की पहचान ध्वनि यंत्र मात्र से कहीं ज्यादा सियासी हो गई है। कुछ मु_ी भर लोगों को इससे फैलने वाली आवाज भले ही सुकून देती हो, लेकिन बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो लाउडस्पीकर के सताये हुए होते हैं। यह ध्वनि प्रदूषण तो फैलाती ही है, कई लोगों के लिए डिप्रेशन का कारण भी बन जाती है। खासकर यह मरीजों, बुजुर्गों,छात्रों और धार्मिक स्थलों तथा मैरिज हॉलों के आसपास रहने वालों के लिये तो अभिशाप जैसा है। इसका उपयोग कई बार विवाद बढ़ाने और जनता को भडक़ाने में भी खूब किया जाता है। ऐसा नहीं है कि इस भोंपू के लिये कोई नियम-कानून नहीं हैं,लेकिन इसका प्रयोग करने वालों ने इसकी कभी परवाह नहीं की तो सत्तारूढ़ दल भी सियासी मजबूरी के चलते इसके शोर से पीडि़तों को कभी मुक्त नहीं करा पाया, यह सब तब हुआ जबकि सरकार के पास सभी कानून मौजूद थे। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक तमाम मौकों पर भोंपू के बेजा उपयोग पर सरकारों को फटकार लगा चुकी है,लेकिन यह समस्या बढ़ती चली गई।
करीब 30 वर्ष पूर्व 1987 में भोंपू को लेकर उत्तर प्रदेश नगर महापालिका की तरफ से विस्तार से दिशा-निर्देश निर्धारित करते हुए प्रोबेशन ऑफ न्वायस एंड रेगुलेशन ऑफ लाउडस्पीकर एक्ट बनाया गया था, जिसमें मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारों और चर्च सहित तमाम मौकों पर बजाये जाने वाले लाउडस्पीकर के लिए लाइसेंस अधिकारी से इजाजत लेने की बात सहित, लाउडस्पीकर के प्रकार जैसे तमाम नियमों की रूपरेखा खींची गई थी। इसी प्रकार केन्द्र ने भी ध्वनि प्रदूषण नियम 2000 में स्पष्ट किया है कि किस क्षेत्र में कितने डेसीबल तक की ध्वनि तीव्रता हो सकती है। इसके बावजूद प्रशासन की ढिलाई का फायदा उठाकर बहुत से धार्मिक स्थल ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग करने लगे। किसी ने भी विचार नहीं किया कि इससे छात्रों की पढ़ाई में बाधा पहुंच सकती है या फिर बीमारों को कष्ट पहुंचेगा। लाउडस्पीकर बारातों,जागरण और जुलूसों के दौरान रात्रि में अक्सर लोगों की नींद खराब करते रहते हैं,जबकि रात्रि दस बजे के बाद और सुबह छह बजे से पहले लाउडस्पीकर बजाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है। तब भी किसी धार्मिक स्थल के कर्ताधर्ताओं ने लाउडस्पीकर बजाने की अनुमति सरकार से नहीं मांगी थी। क्योंकि कुछ लोगों को लगता है कि धर्म की आड़ में उन्हें सियासत से संरक्षण और कानून व्यवस्था से छुटकारा मिल सकता है।
दरअसल, जब भी कोई सरकार जनहित में कोई कदम उठाती है तो विपक्षी उसमें सियासी रंग देखने लगते हैं, जिस कारण सरकारों को भी अपने कदम पीछे खींचने पड़ जाते हैं। अबकी जरूर नजारा कुछ बदला हुआ नजर आ रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए की कडक़ फैसले लेने के लिये सुर्खियां बटोर रही योगी सरकार इस मसले को भी पूरी गंभीरता के साथ लेगी। शुरूआती प्रयासों से ऐसा लग भी रहा है। सबसे अच्छी बात यह है कि सरकार की मंशा भांप कर इस बार सरकारी मशीनरी भी मुस्तैदी दिखा रही है,जो पहले नहीं देखने को मिलती थी।
फिलहाल योगी सरकार ने ध्वनि प्रदूषण पर शासन से रिपोर्ट मांगी है, लेकिन सफलता तभी मिलेगी जबकि बिना इजाजत लाउड स्पीकर बजाने वालों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जायेगी। ध्वनि प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ सजा और जुर्माने का ऐलान करके समस्या को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। मगर इसके साथ-साथ इसका दायरा भी बढ़ाया जाना जरूरी हैं। बात सिर्फ लाउडस्पीकर तक नहीं सडक़ पर बेवजह हार्न बजाकर उत्तेजना फैलाने वालों पर भी शिकंजा कसा जाना
जरूरी है।

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