गर्माते आर्कटिक का कहर

श्रीशन् वेंकटेश

पूर्वी अमेरिका और कनाडा बीते कुछ हफ्तों से गहन शीत लहर की चपेट में हैं। इस इलाके में सात दशकों का यह सबसे ठंडा साल है। तापमान अंटाकर्टिका और मंगल ग्रह से भी कम हो गया है। ‘बम साइक्लोन’ ने हालत को और भी अधिक बिगाड़ दिया है। सामान्य औसत से 11 डिग्री सेल्सियस नीचे के तापमान का कारण यह बताया जा रहा है कि ऊपरी क्षेत्रों, खासकर अलास्का और उसके आसपास में तापमान गर्म
हुआ है। इससे जेट स्ट्रीम में एक उभार बना है, जिसका रुख अमेरिका के पूर्वी हिस्से और कनाडा की ओर हुआ। जेट स्ट्रीम वह हवा है, जो ऊपर से बाहर निकल कर आ रहा है। ऐसा जेट स्ट्रीम लंबे समय तक असर डालने के लिए कुख्यात रहा है और अभी यही असर हम देख रहे हैं।
इसी हालात में चार जनवरी को आये तूफान ने शीत लहर और बर्फबारी से ठंड और भी बढ़ी है। तूफान की तेजी वायुमंडलीय दबाव में भारी कमी की वजह से है। हालांकि, इसका सबसे अधिक असर समुद्र के ऊपर हुआ है, पर माना जा रहा है कि इस इलाके में आया यह सबसे खतरनाक इतर-उष्कटिबंधीय तूफानों में से एक है। आशंका यह भी जतायी जा रही है कि मौसम सामान्य होने में देर हो सकती है, क्योंकि मौजूदा स्थिति में ध्रुवीय चक्रवात का भी खतरा है। यह चक्रवात हाल के दशकों में उत्तरी गोलार्ध में भयानक ठंड का सबसे बड़ा कारण रहा है।
फिलहाल, ठंड का यह कहर अभी जारी रहने की आशंका है। यह भी एक तथ्य है कि दुनिया का औसत तापमान बढ़ा है। वर्ष 2016 में आयी ऑस्ट्रेलियाई सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1910 से अब तक धरातल की हवा और समुद्र के तापमान में औसतन एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज हुई है और तेज गर्मी की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हुई है।
पिछले सप्ताह से उत्तर समेत भारत के कई हिस्सों में शीतलहर का प्रकोप देखा गया है। इस शीतलहर की हवा ज्यादातर अफगानिस्तान और ईरान की ओर से आयी है। अमेरिका और कनाडा में जो ठंड की स्थिति है, उससे हमारे देश या आसपास के देशों के ठंड से कोई संबंध मुझे नजर नहीं आया है। लेकिन, यदि ध्रुवीय चक्रवात की स्थिति पैदा होती है, तो यह संभव है कि उसका असर भारत के मौसम पर भी पडऩा तय है। अगर ऐसा होता है, तो उत्तर भारत में ठंड का मौसम कुछ लंबा हो जायेगा। ऐसे में मेरा मानना है कि इस वर्ष मार्च तक जाड़ा पड़ सकता है।
यह भी समझना चाहिए कि वैश्विक तापमान बढऩे का मतलब यह नहीं है कि ठंड नहीं बढ़ सकती है। कई प्राकृतिक कारकों की वजह से मौसम में बदलाव नजर आ रहे हैं। जैसा कि हम उत्तरी अमेरिका और कनाडा की ठंड में देख रहे हैं। पिछले कुछ सालों से इस तरह के ठंड की घटनाएं ज्यादा घटित हो रही हैं। जब ठंड की स्थिति होती है, तो बहुत ठंड पड़ती है, और यदि ठंड नहीं पड़ती, तो सूखे की स्थिति पैदा हो जाती है। यहां रेखांकित करना जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन और मौसम के बीच में सीधे-सीधे कोई रैखिक संबंध खींचना ठीक नहीं है। इस कारण मौसम की हर घटना- बारिश, ठंड या गर्मी-को हम सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से नहीं जोड़ सकते हैं।
बस हम यह निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि जलवायु परिवर्तन से मौसम के मिजाज में तेज बदलाव और आवृत्ति बढऩे की संभावना बढ़ चुकी है। जो घटना कई सौ साल में एक-दो बार होती थी, हर दशक में एक बार होने लगी है.। यही कारण है कि सूखा, बाढ़, हिमस्खलन, बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं की बारंबारता बढ़ी है। इसलिए यह कह सकते हैं कि गर्मी हर जगह अधिक पड़ रही है, जैसा कि हम ऑस्ट्रेलिया में देख रहे हैं, और ध्रुवीय क्षेत्रों में ऊपरी इलाकों में गर्मी से ठंडी हवा के बाहर आने से आसपास के देशों में सर्दी का कहर है। जिसकी वजह से जन जीवन अस्त व्यस्त हो गया है।

Pin It