महकमे में सफाई की जरूरत

दाढ़ी वाले वजीर यत्र-तत्र सर्वत्र झाड़ू लेकर नमूदार हो जाते हैं। लेकिन उनकी झाड़ू पर उनके महकमे के लोग की झाड़ू फेर रहे हैं। शहर की सफाई की हालत पूछिए मत। जित देखो तित गंदगी। दाढ़ी वाले वजीर की फटकार उनके महकमे के लोग एक कान से सुनते हैं और दूसरे से निकाल देते हैं। अब वजीर साहब को कौन समझाए कि सडक़ों की सफ ाई से पहले महकमे की सफाई कीजिए वर्ना ये आपका सिंहासन हिला देंगे। बताया यह जा रहा है कि वे अधिकारियों पर भरोसा अधिक करते हैं और अधिकारी इसी भरोसे पर वजीर साहब को नचा रहे हैं।
महात्मा की कुर्सी ताक रहे नेताजी

महात्मा जी नोएडा क्या गये विरोधी खेमे में खुशी की लहर दौड़ गयी है। साइकिल वाले दल के मुखिया खूब खुश हैं। खुशी में फूल नहीं समा रहे नेताजी ने यहां तक कह दिया कि नोएडा जाने का परिणाम तो महात्मा जी को भुगतना ही पड़ेगा। दरअसल इन दिनों महात्मा जी ने जो रफ्तार पकड़ी है उसको हाथ, हाथी और साइकिल वाले मिलकर भी रोक नहीं पा रहे हैं, ऐसे में साइकिल वालों ने महात्मा जी को रोकने के लिए नोएडा पर भरोसा जताया है। देखने वाली बात यह होगी कि साइकिल वाले नेताजी का यह अंधविश्वास कायम रहता है या बाबा अपना भगवा परचम फिर लहराते हैं।

मोर के चक्कर में बटेर भी गई

बेचारे नेताजी अपने किए पर अब पछता रहे हैं। किसी ने पूछा नहीं कि कब जा रहे शपथ लेने, नेताजी की आंखों से गंगा-जमुना बहने लगती हैं। नेताजी को समझ नहीं आ रहा है कि उन्होंने गलती की या फिर मेवा मिलने का समय नहीं आया है। कहीं मोर के चक्कर में बटेर भी तो हाथ से नहीं चली गई। नेताजी के चंपुओं का कहना है, इस दुर्गति के लिए नेताजी खुद जिम्मेदार हैं। आराम से साइकिल की सवारी गांठ रहे थे, लेकिन अचानक कमल दल वालों के झांसे में आ गए। आव न देखा ताव अपनी एमएलसी की कुर्सी को भी लात मार दिया और इसी कुर्सी पर चढक़र बाबा जी अब खुलकर राज कर रहे हैं। लेकिन नेताजी इतने कच्चे खिलाड़ी नहीं है। वे सोच रहे थे कि इसके बदले उनको उच्च सदन जरूर भेज दिया जाएगा। बेचारे यही सपना सोते-जागते देख रहे हैं। पता नहीं कब उनका सपना पूरा होगा। फिलहाल झांसे में आकर नेताजी अपना सिर धुन रहे हैं।

बेचारे नेताजी अपने किए पर अब पछता रहे हैं। किसी ने पूछा नहीं कि कब जा रहे शपथ लेने, नेताजी की आंखों से गंगा-जमुना बहने लगती हैं। नेताजी को समझ नहीं आ रहा है कि उन्होंने गलती की या फिर मेवा मिलने का समय नहीं आया है। कहीं मोर के चक्कर में बटेर भी तो हाथ से नहीं चली गई। नेताजी के चंपुओं का कहना है, इस दुर्गति के लिए नेताजी खुद जिम्मेदार हैं। आराम से साइकिल की सवारी गांठ रहे थे, लेकिन अचानक कमल दल वालों के झांसे में आ गए। आव न देखा ताव अपनी एमएलसी की कुर्सी को भी लात मार दिया और इसी कुर्सी पर चढक़र बाबा जी अब खुलकर राज कर रहे हैं। लेकिन नेताजी इतने कच्चे खिलाड़ी नहीं है। वे सोच रहे थे कि इसके बदले उनको उच्च सदन जरूर भेज दिया जाएगा। बेचारे यही सपना सोते-जागते देख रहे हैं। पता नहीं कब उनका सपना पूरा होगा। फिलहाल झांसे में आकर नेताजी अपना सिर धुन रहे हैं।

खुल गई पोल
पूर्वी क्षेत्र में तैनात एक इंस्पेक्टर साहब की चर्चा गर्म है। एक वारदात ने साहब की डींग मारने की पोल खोल दी है। जब से थाना संभाला है लोगों के बीच खूब डींग मारते थे। फरियादी के सामने ऐसे-ऐसे किस्से सुनाते कि बेचारा अपनी फरियाद भूल जाता। शेर के पंजे में फंसे शिकार के मानिंद फडफ़ड़ता और जैसे ही साहब की आंख फिरती वह नौ दो ग्यारह हो जाता। कौन जाए फरियाद लेकर। लेकिन पता चला है कि साहब की इस हेकड़ी ने अब उनकी हालत खराब कर दी है। ऊपर से रोज पूछा जा रहा है कि अरे आपके थाना क्षेत्र में एक बुजुर्ग की हत्या हुई थी, उसका कुछ पता चला या बस बदमाश यूं ही आपसे थर-थर कांपते हैं।

दिव्य पुडिय़ा की शरण में मुखिया जी

शहर को चमकाने वाले विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे मुखिया जी काफी तनाव में हैं। दाढ़ी वाले वजीर ने जब से उनको हाई डोज दी है नाचे-नाचे फिर रहे हैं। दवा का असर दिमाग तक चढ़ गया है। दिमाग की नसें तडक़ने लगी हैं। रही सही कसर दिलजले निकाल रहे हैं। खबरनवीसों को पीछे लगा दिया है। बेचारे चैन से कुर्सी पर बैठ भी नहीं पा रहे हैं। वे कुर्सी पर बैठे नहीं की पता नहीं कहां से खबरनवीस हुक्का उनकी मुंह की तरफ कर देते हैं। हां तो साहब बताइए ऐसे ही स्मार्ट सिटी बनाएंगे। अब बेचारे क्या जवाब दें। आदमी लगा रखे हैं। अब वे काम न करें तो उनका क्या दोष। अगर भइया ऐसी बात है तो मुखिया काहे के हो? अगला सवाल सुनते ही मुखिया दोहरे हो जाते हैं। बड़ी मेहनत से दिव्य पुडिय़ा से पिड़ छुड़ाया था लेकिन तनाव ने फिर पुडिय़ा के भरोसे कर दिया। अब तो साहब खुद भी टेबल के नीचे चैतन्य चूर्ण मलते हैं। कहां तक लोगों से कहे ले आओ पुडिय़ा। दिमाग की नसें बची रहेगी तो कुर्सी का ताप भी झेल लेंगे।

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