देश में हो रहे बदलाव को बाधित कर रहा अंतरजातीय विवाह

संतोष उत्सुक

बच्चों के लिए जीवनसाथी खोजने में अभिभावकों की भूमिका बदल रही है। देश या विदेश में नौकरी कर रहे कुछ युवाओं ने यह शुभ कार्य स्वयं कर माता पिता की चिंता कम की है। इधर अभिभावक भी बच्चों द्वारा स्वयं जीवनसाथी चुनने को तरजीह दे रहे हैं। अंतरजातीय विवाह होने से जातीय सद्भावना मजबूत हो रही है। बढ़ती वैवाहिक साइट्स के कारण रिश्तेदारों व मित्र परिचितों का दखल सिमट गया है। समाचार पत्र जातीय आधार पर वैवाहिक विज्ञापन छाप रहे हैं। वर्ण, जाति आधारित वैवाहिक साइट्स उपलब्ध हैं। संभावित वधू, वर या उनके अभिभावकों से बात करने पर पता चलता है कि हम सब बढ़ते विकास, फैलती वैशविक्ता, शिक्षा की चकाचौंध में भी जाति की लकीर को जम कर पीट रहे हैं। घर से बाहर निकल जॉब करने वाले बच्चे प्रोफाइल खुद मैनेज करते हैं कोई पसंद आता है तो हां कर देते हैं मगर बात उनके माता पिता तक पहुंचती है तो वे समाज के बहाने जाति बीच में खड़ी कर देते हैं।
उनके लिए अपनी कम्युनिटी के विश्वस्त माहौल से निकलकर किसी और पर विश्वास करना मुश्किल लगता है। वे इसे अपनी जातीय शुद्धता के लिए प्रदूषण व खतरा मानते हैं। अधिकांश लोगों की मानसिकता व सोच में बदलाव नहीं आ पा रहा, माता-पिता द्वारा तय किए जा रहे अधिकतर विवाहों में जातीय भावना प्रबल रहती है। एक इंजीनियर ने बताया कि वह इंटरकास्ट शादी करने के लिए तैयार है। घर से दो सौ किलोमीटर दूर नौकरी करती है। उसने अपने माता-पिता से बात की मगर चूंकि उसकी अस्सी साल की दादी नहीं मानती इसलिए वे भी नहीं मान सकते। अपने शहर से हजारों मील दूर दक्षिण भारत में जॉब कर रहे पीएचडी अभिभावक से उनकी बहन के बारे बात हुई तो बोले हम तो कास्टिज्म को मानते हैं। मैंने उनसे कहा आप इतना पढऩे के बाद भी कितने कंजर्वेटिव हैं तो उन्होंने फोन बंद कर दिया। स्टाफ नर्स से शादी करके युवक उसे विदेश ले जाना चाहता है। लडक़ी बोली मैं तो तैयार हूं लेकिन मेरी मम्मी कहती है कि हम तो……..पैदा हुए इसलिए नहीं हो सकती। मैंने उससे कहा बेटा आप तो मेडिकल प्रॉफेशन से हो, बच्चा जब जन्म लेता है जीवित मांस होता है। कौन सी कास्ट का होता है वह। उस पर हम जैसी चाहे स्टैंपिंग कर सकते हैं। वह चुप रही, क्या करती संस्कारों की गिरफ्त में थी। जाति की गिरफ्त इतनी जल्दी ढीली पडऩे वाली नहीं है। ग्लोबलाइजेशन ने काफी कोशिश की मगर समाज के राजनीतिक व धार्मिक सेवकों की वजह से हमारे अधिकांश शिक्षित समाज की सोच अभी अनपढों से भी गई गुजरी है। देश डिजिटल होने को बेताब है मगर मानवीय विकास के धरातल पर हम ज्यादा विकसित नहीं हो पाए। देखा जाए तो शून्य हाथ लगा, बेटियां जस की तस। पढ़ लिखकर नौकरी कर रहे बच्चों के दिमाग में हम पढ़े लिखे विकसित, अभिजात्य, सुसंस्कृत व निरंतर सभ्य कहलाने वाले अभिभावक कितने संजीदा तरीके से आज भी जातिवाद का जहर इंजेक्ट कर रहे हैं यह अनुभव कर शर्म आती है। कुछ ‘समझदार’ बच्चे जाति, धर्म एवं अन्य चीजें देख कर ‘प्रेम’ करते हैं ताकि विवाह में अभिभावक हरी झंडी दिखा दें। इधर कुछ अभिभावक बदल भी रहे हैं और अपने बच्चों के अंतरजातीय विवाह हेतु खुला दिल व उदार सोच अपना रहे हैं। इस तरह कुछ लोग नए व आपसी समझ भरे समाज की रचना में सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं।
बच्चे भी क्या करें, पहले पढऩे फिर व्यावसायिक संघर्ष में उम्र निकल रही होती है तो विवाह के बारे में संजीदगी से सोचना पड़ता है। अपनी कम्युनिटी या जाति में जीवनसाथी नहीं मिलता तो आम तौर पर संकीर्ण मानसिकता वाले अभिभावक मजबूरन दूसरी जाति में विवाह करने को तैयार हो जाते हैं। यहां उनकी सामाजिक रुतबे वाली सोच स्वत: धराशायी होने लगती है। गरीब, कम शिक्षित, ज्यादा उम्र, अक्षमता, मंगलिक तलाकशुदा व अन्य कारणों से विवाह न होने के कारण समझ आने लगता है कि दूसरों को छोटा समझने की गलत सोच तो हमारी अपनी ही है। स्वार्थपूर्ण स्थिति में, संकीर्ण सोच वाले दूसरी जातियों में विवाह करने हेतु तैयार हो जाते हैं। क्यूं नहीं वे शादी पर ही रोक लगा देते। जिंदगी व शारीरिक जरूरतों के बारे में उन्हें तब पता चले जब सभी जातियों वाले सख्ती बरतें और अंतरजातीय विवाह न हो पाएं। लेकिन ऐसा नहीं होता, सकारात्मक व सही सोच वाले समझदार लोग समाज के हर वर्ग में होते हैं उनसे प्रेरणा पाकर ही जातिवाद में सेंध लगती है। अनेक युवा अभिभावकों के विरुद्ध जाकर भी तो विवाह करते हैं जहां बाद में आशीर्वाद दिया जाता है। देखा जाए तो संकीर्ण मानसिकता के लोग राजनीतिज्ञों से कम नहीं हैं जिनके कारण समाज बिखरा पड़ा है। पहले ही सोच लिया जाए तो विवाह के मीठे में जाति की कड़वाहट बिल्कुल भी न हो।

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