ध्वनि प्रदूषण पर हाईकोर्ट की सख्ती और सरकार

सवाल यह है कि जनहित के मुद्दे पर हर बार कोर्ट को हस्तक्षेप क्यों करना पड़ता है? क्या ध्वनि प्रदूषण से नागरिकों की सेहत पर पडऩे वाले विपरीत प्रभाव को सरकार समझ नहीं पा रही है? आखिर सत्तारूढ़ पार्टियां क्यों जनहित में कदम उठाने में भी सियासी नफा-नुकसान देखती रहती हैं? प्रदेश में चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुके ध्वनि प्रदूषण के प्रति सरकारें आंख और कान क्यों बंद रखती हैं?

ध्वनि प्रदूषण पर हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार ने नया आदेश जारी किया है। इसके मुताबिक अब बिना अनुमति के लाउडस्पीकर नहीं बजाए जा सकेंगे। यह नियम सभी धार्मिक स्थलों, विभिन्न आयोजनों और शादी-बारात जैसे कार्यक्रमों पर लागू होंगे। हाईकोर्ट ने इस मामले पर सरकार से एक विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की है। सवाल यह है कि जनहित के मुद्दे पर हर बार कोर्ट को हस्तक्षेप क्यों करना पड़ता है? क्या ध्वनि प्रदूषण से नागरिकों की सेहत पर पडऩे वाले विपरीत प्रभाव को सरकार समझ नहीं पा रही है? आखिर सत्तारूढ़ पार्टियां क्यों जनहित में कदम उठाने में भी सियासी नफा-नुकसान देखती रहती हैं? प्रदेश में चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुके ध्वनि प्रदूषण के प्रति सरकारें आंख और कान क्यों बंद रखती हैं?
पूरे देश में ध्वनि प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत यहां के तमाम शहर इसकी चपेट में हैं। ध्वनि प्रदूषण के कारण लोगों की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। तेज शोर के कारण लोगों की न केवल कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है बल्कि उनकी सुनने और समझने की शक्ति पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। दिल के मरीजों के लिए भी तेज शोर नुकसानदायक होता है। बावजूद इसके शहरों में तेज शोर थमने का नाम नहीं ले रहा है। धार्मिक स्थलों, बड़े आयोजन और शादी विवाह के मौके पर लोग जमकर लाउडस्पीकर का प्रयोग करते हैं। वहीं दूसरी ओर ध्वनि प्रदूषण की कई रिपोर्ट आने के बावजूद सरकारें इस पर नियंत्रण लगाने की जहमत उठाती नहीं दिख रही हैं। बढ़ते ध्वनि प्रदूषण को लेकर याचिकाकर्ता मोतीलाल यादव ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से ध्वनि प्रदूषण नियम-2000 का अनुपालन कराना सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार सजग हुई है। सार्वजनिक और निजी स्थानों पर लाउडस्पीकर की ध्वनि सीमा क्रमश: दस और पांच डेसिबल निर्धारित की गई है। शादी समारोहों, जुलूस व जलसों के दौरान भी इस नियम का पालन कराया जाएगा। गौरतलब है कि पर्यावरण (संरक्षण) 1986 अधिनियम के तहत यह दंडनीय अपराध है। इसका उल्लंघन करने पर पांच साल का कारावास या एक लाख का जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है। हाईकोर्ट के आदेश में बाद सरकार ने पहल की है। उम्मीद है, सरकार हाईकोर्ट के आदेश को पूरी इच्छाशक्ति से लागू कराएगी। इसके अलावा सरकार को सडक़ पर चलने वाले वाहनों के तेज शोर वाले हार्न पर भी प्रतिबंध लगाने पर विचार करना चाहिए।

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