सरकार आधार से अधिकारों को भी जोड़े

पवन दुग्गल

आधार डाटा लीक होने का नया खुलासा चिंताजनक है। इसमें बताया गया है कि देश में एक ऐसा रैकेट काम कर रहा है, जो महज 500 रुपये में सभी के आधार डाटा मुहैया करा सकता है। हालांकि आधार बनाने वाले भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी यूआईडीएआई ने इसका खंडन किया है। उसका कहना है कि इसकी सुरक्षा में सेंध लगाना नामुमकिन है। बावजूद इसके, जिस तरह से नियमित अंतराल पर आधार डाटा लीक होने या लोगों की गोपनीय जानकारियों के सार्वजनिक होने की खबरें आती रही हैं, वे तस्दीक करती हैं कि आधार डाटाबेस पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
अब आधार हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है। देश के लगभग 1.2 अरब लोगों के जीवन की जानकारियां अब इसके साथ जुड़ चुकी हैं। हालांकि, जब इसकी शुरुआत हुई थी, तो इसे स्वैच्छिक बनाया गया था। यानी, अपनी मर्जी से ही कोई शख्स इससे जुड़ता। यहां तक कि 2016 में बने आधार कानून की बुनियाद भी यही थी कि आधार स्वैच्छिक रहेगा। इसीलिए कानून में केवल केंद्रीय पहचान डाटा भंडार की सुरक्षा की बात कही गई थी। मगर बाद के दिनों में सरकार ने दिशा बदलना शुरू किया और वह इसे विभिन्न सेवाओं में अनिवार्य बनाने लगी। इससे आधार के आसपास एक इको-सिस्टम विकसित होने लगा। इस इको सिस्टम में साइबर सुरक्षा को लेकर कोई काम नहीं किया गया है।
जब इस इको-सिस्टम में अलग-अलग सेवा प्रदाता कंपनियां हस्तक्षेप करने लगीं, तो साइबर सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी बढऩे लगीं। यही कारण है कि आधार-सिस्टम में लगातार सेंध की खबरें आ रही हैं। मगर ताजा खुलासा इसलिए ज्यादा चिंतित करता है, क्योंकि इसमें पूरे आधार डाटाबेस की कॉपी हासिल करने की बात कही गई है। जबकि अभी तक आधार में सेंध के छोटे-छोटे मामले ही सामने आए थे। यूआईडीएआई ने ही पिछले साल 40-45 के करीब मुकदमे दर्ज कराए हैं। कुछ महीने पहले विकीलीक्स ने एक स्टोरी प्रकाशित की थी, जिसमें यह बताया गया था कि भारत का अधिकांश आधार डाटाबेस अमेरिकी एजेंसियों के पास है। इसकी वजह यह है कि कुछ साल पहले तक आधार बनाने के काम में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी शामिल थीं। लिहाजा यह तो तय है कि हम पहले ही अपना हाथ आग में डाल चुके हैं, पर बात जब गोपनीय जानकारियों पर खतरे की हो, तो मेरा मानना है कि भारत एक ज्वालामुखी के ऊपर बैठा हुआ है, जो कभी भी फट सकता है। यह ऐसा अवसर है, जब हमें सोचना चाहिए कि आधार को किस तरह से ज्यादा सुरक्षित और सशक्त बनाया जा सके, ताकि लोगों की डिजिटल पहचान और उनकी निजता के अधिकार का हनन न हो। सरकार का दायित्व इसलिए भी और बढ़ जाता है, क्योंकि सर्वोच्च अदालत जीवन जीने के मौलिक अधिकार में निजता के अधिकार को शामिल कर चुकी है। जाहिर है, यदि आधार की सुरक्षा में सेंध लगेगी, तो लोगों की निजता का भी उल्लंघन होगा।
इसका रास्ता काफी हद तक आधार कानून में संशोधन करके निकाला जा सकता है। साइबर सुरक्षा को लेकर इस कानून में अभी तक मजबूत प्रावधान नहीं हैं। इसमें एक और ऐतिहासिक गलती हुई थी। इसमें साफ-साफ कहा गया है कि आधार से जुड़ी जानकारियां लीक होने पर शिकायत करने का अधिकार आधार-धारक शख्स के पास नहीं, बल्कि इसको जारी करने वाली एजेंसी, यानी यूआईडीएआई के पास होगा। यानी आधार से जुड़ी मेरी जानकारियां यदि चोरी हो जाएं तो मैं मुकदमा दर्ज नहीं कर सकता, और मुश्किल यह है कि शिकायत दर्ज कराने को लेकर यूआईडीएआई का रुख अभी तक उदासीन रहा है।
यह काम सरकार का है और लोगों को यह अधिकार देना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। इन संशोधनों की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि आधार सिर्फ एक सामान्य नंबर भर नहीं है। यह संवेदनशील डाटा है। इसके तहत उंगलियों व आंखों की पुतली के जो निशान लिए जाते हैं, वे हर व्यक्ति के अलग-अलग होते हैं। यानी हर शख्स की यह यूनीक पहचान होती है। अगर किसी की यह पहचान चोरी हो जाए, तो समझा जा सकता है कि उसकी डिजिटल
निजता किस कदर नकारात्मक रूप से प्रभावित होगी। इस मामले में सेवा प्रदाता कंपनियों पर
भी दबाव बनाने की आवश्यकता है। लिहाजा ताजा खुलासे को एक सबक के रूप में लेना चाहिए और सकारात्मक नजरिया अपनाते हुए आधार डाटाबेस को सशक्त बनाने के लिए एक सुनिश्चित कार्यक्रम लाना चाहिए।

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